|विवाह के एक हफ्ते बाद प्राचीर अलका को मुंबई ले गया| अलका के सास-ससूर साथ गये और कुछ दिन उनके साथ रहे| फिर अपने पुश्तैनी मकान में जोकि आगरा में था चले गये
समय पंख लगाकर उड़ता रहा|देखते-देखते कब एक साल बीता पता ही नहीं चला|अलका के सास- ससुर कई बार आए उन दोनो से मिलने|मगर उन्होने कभी उसे आगरा आने की जिद नहीं की| अलका से सबका व्यहवार सामान्य था|उसने प्राचीर से कई बार आगरा चलने की जिद की मगर हर बार वो टाल गया इस बात को|
अलका ने इस बात को कोई ज्यादा अहमियत न दी|दोनो बहूत खुश थे और अलका के लिए यही काफी था|फिर एक दिन अलका को पता चला की उसके पाँव भारी है| खुशी से झुम उठी वो तो| खुश प्राचीर भी था मगर अलका को लगा कि कही कोई काटाँ है जिसकी चुभन को वो नजरअंदाज कर रही है|
मन में कोई खटका हुआ और उसने फिर प्राचीर को आगरा चलने को कहा|इधर बहूत दिनो से प्राचीर के माँ पापा नहीं आ पाये थे उनके पास|शायद इस बात की प्राचीर कोबहूत चितां हुई और इस बार जीत अलका की हुई|प्राचीर ने कुछ बुझे मन से आगरा चलने की हामी भर दी|मगर एक हफ्ते से ज्यादा न रुक पाने की शर्त भी लगा दी| अलका ने तुरंत हामी भर दी|
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