आज फिर वो बेहद उदास थी|चारो ओर गहन अधेंरा और आशा की कोई किरण नहीं|आगे जीवन भयावह चेतावनी देता सा लग रहा था|
उसे जीवन से ऐसी अपेळा न थी|उसने हमेशा भरपूर जीवन जीने की आशा रखी थी|स्कुल और फिर कॉलेज हमेशा उसके प्रिय रहे|जहाँ वो अपनी दर्जनो सहेलियो से हमेशा घिरी रहती थी|पढ़ाई में सदा अव्वल रही|उसने पोस्ट ग्रेजुएट में जिले में सर्वप्रथम स्थान प्राप्त किया था|
जिन्दगी की उन सुनहरी यादो में खोई घटों बिस्तर में पड़ी रही|
माँ ने धीरे से उसे आवाज दी, 'अलका'
अलका वैसी ही बूत बनी पड़ी रही|
माँ ने पीछे से आकर उसे झकझोरा, 'कब तक यूँ ही पड़ी रहोगी| हाथ -मुँह धो ले|तब तक मैं गरमागरम चाय बनाती हूँ|अदरक पड़ी चाय तुझे सर्दियो में बहूत भाती थी|
माँ ने अतीत से उसे खींच लाना चाहा|कुछ माँ का मान रखने और कुछ चाय की तलब ने उसे उठने को मजबूर कर दिया|वो बेमन उठी|सिलवटो से भरी शॉल को कस कर अपने चारो ओर लपेटा और मुँह धोने चली गयी|माँ एकटक देखती रही उसे जाते|बेटी का दुःख उसे अदंर तक हिला गया| मगर बेटी के आगे इसका कोई अहसास नहीं दिलाती थी|
जब तक अलका मुँह धो कर आयी माँ ने पकौड़ो के लिए बेसन घोल लिया था और चाय का पानी भी चढ़ा दिया था|
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