१० बजे का गया बिरजू दोपहर एक बजे पहुचाँ| तक प्रिया वही कमरे के सामने बैठी रही माली की औरत से बात करती हूई|मौसम काफी खराब हो चला था| अगर वो अब भी वो चलने की सोचती तो पहाड़ी रास्ते ऐसे मौसम में चलने के लिए बिल्कुल ठीक नहीं था|
बिरजू को देख कर लगा सारी रात सोया नहीं वो| बदन में जगह जगह मिट्टी लगी थी और खरौचों के निशान भी|प्रिया का मन इतना उलझा था उसकी हिम्मत ही नहीं हुई बिरजू से कुछ और पुछ लेने की
जाने क्या रहस्य छुपा हो इसकी गर्त में| जिसके लिए कम से कम अभी तो वो तैयार नहीं थी
बिरजू ने जब प्रिया अपने कमरे के आगे बैठे देखा था तभी उसे अहसास हो गया था कि तमस ने दिखायी होगी अपनी हरकत|
प्रिया ने पुछ ही लिया कहाँ गायब था इतनी देर| जवाब नहीं था बिरजू के पास| प्रिया समझदार थी ताड़ जाती| कुछ कह ही देने की गरज से बिरजू पास के गाँव में जरूरी काम से जाने की बात कह गया| नजर न मिला पाया प्रिया से|
मौसम काफी खराब रहा दो-तीन दिन तक| मगर इस बीच कुछ नया नहीं हुआ|
रेस्ट हाउस से लगता एक फार्म हाउस बना था| दोनो की बाड़े सटी हुई|उस दिन की हरकत के बाद तमस का उससे आमना-सामना तो नहीं हुआ मगर उसने रात के सन्नाटे में तमस को बाड़ पार कर फार्म हाउस जाते देखा|साथ ही एक लबां चौड़ा साया भी तमस के पीछे हो लेता| आपस की दूरी बनाए रखता हुआ| डील-डौल बिरजू सा आभास देता|
प्रिया को लगा की बहूत हुआ अब उसे करना ही है कुछ| इतना घुट कर जीना उसकी फितरत में वैसे भी नहीं था|
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