चौथी किस्त

सुबह जब दरवाजा लगातार पीटा जाने लगा तब उसकी नींद उचटी|कुछ देर तो उसे ये अहसास होने में लगा कि वो है कहाँ| फिर जब उठी तो ये तय कर लिया उसने कि आज वो बिरजू को ले वापस चली  जाएगी|दरवाजा खोला तो सामने माली की ब्याहता खड़ी थी हाथ में चाय की टे् लिए खड़ी थी| इस नयी स्थिती के लिए प्रिया बिल्कुल तैयार नहीं थी|
    माली की औरत केवल यही बता पाई कि तड़के भाईजी कहीं गए हैं १० बजे वापस आने का बोल कर|मौसम का मिजाज भी ठीक नहीं लगा|काले बादल घिर आए थे|तमस भी कहीं नजर नहीं आया|बिरजू और तमस का एक साथ न होना एक नयी चिंता दे गया|
       चाय पी नहाने चली गयी शायद तब तक बिरजू आ जाए|नहा कर गीले बाल लिए बिरजू को देखने बरामदे में आ खड़ी हुई|तभी लगा कि उसके पीछे कोई खड़ा है|झटके से जो मुड़ी पीछे तो तमस खड़ा था अपनी गंदी नजरे उस पर गड़ाता हुआ|सिहर सी उठी वो|
   सामने से हज जाना चाहा उसने मगर तमस ने आगे बढ़ कर उसका रास्ता रोक लिया|
    'रात बहूत चौकसी थी| हम तो बैठे थे यही डर किस बात का लगा'
    उसका कहने का अदांज शैतानी तबीयत का था प्रिया सिहर उठी| तमस के पीछे देख उसने जोर से बिरजू को आवाज दी| हड़बड़ा ही गया तमस| बसइतना काफी था प्रिया के लिए| वे एक तरह से तमस को धकियाते हुए दौड़ पड़ी पीछे नौकरो के कमरो की तरफ| तमस हाथ मलता रह गया|
   बिरजू के कमरे के सामने पहूचँ देर तक कापँती रही| सुहास की बेतरह याद आयी और अपनी बेबसी पर रोना भी|
   

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