चौथी किस्त

बेटा देख रहा था|माँ के चेहरे के बदले भाव दिखे पर उसे माँ के मन मै चल रही उधेड़-बून के बारे मे तनिक भी खबर न हुई| माँ की कमजोरी था वो|
माँ से बोला क्या सोचा आपने|
माँ बोली इतनी जल्दी किस बात की| वक्त दो मुझे दो-तीन दिन का| मेरे लिए सब इतना सहज नहीं|बेटे ने गहरी नजरो से देखा माँ को|बातो को तौल रहा हो|
अजनबी सा बना बेटा चला गया तीन दिन की कह के|
बेटा गया माँ ने राहत की सासँ ली|उन्हे याद आया कुछ दिन पहले शर्मा जी मिले थे|जब वेpost office में काम करती थी तब साथ काम करते थे| जब तक पति जिन्दा थे आना- जाना था| मगर समय के साथ मिलना कम सा हो गया था|
उनकी ही मदद लेनी होगीअकेले नही हो पाएगा|  ऐसा सोच वे कल होने वाले हालातो पर विचार करती सो गयी|
अगले दिन post office पहुचँ गयी| शर्माजी अभी भी वहाँ का थोड़ा बहूत काम देखते थे|वही मिल गये| औपचारिकता के बाद सारी बाते विस्तार से बतायी|शर्माजी उनके घर के हालातो से वाकिफ थे|उन्होने एक अनोखा प्रस्ताव रखा| और माँ की सारी परेशानी का बहूत आसान हल निकल आया|दिल मजबूत करना था बस|

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