बड़ी मन्नतो के बाद पाया था ये बेटा| कहाँ कहाँ नहीं भटकी थी तब वह|पता होता ऐसा कपूत निकलेगा तो निपूती ही रहती
मन में विचारो का ताड़व सा चलने लगा| आज जो ये बेटा इतना मुहँखोल कर बोल गया| इसके आगे भी तो बेटा खड़ा हैं| तब भी मन नहीं तरसा इस अभागे का अपनी माँ के लिए
बेटे का बेटा जब उसके साथ ऐसा करेगा तब जागेगा क्या| तब अहसास होगा क्या इसे|
इसका बोया ये यही पायेगा|मन अवसाद से भर गया|माँ की ममता तिरोहित हो गयी|जो वक्त ने सबक सिखाया और बेटे का मन माँ के लिए तरसा तो ये दिन देखने के लिए वो बैठी रहेगी क्या?
गम की अधिकता गुस्से में बदल गयी| यही सोचा की बेटा किस बिना पर अपना हक जमाता हैं|जो दो दिन अपनी माँ को न पाल पाया| अब उससे आमदनी का जरिया भी छिन लेना चाहता हैं| इस उमर मे एक-एक पैसे के लिए बेटे के आगे हाथ फैलायेगी|
जो बेटे ने रिश्तो को व्यापार समझ लिया तो वो भी इस नये रिश्ते को अजांम तक पहुँचाएगी|ऐसा विचार कर वो उठ खड़ी हुई एक नये सकल्पं एक नयी उर्जा के साथ|
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