माँ-दुसरी किस्त

माँ ताड़ गयी|बेटे के मन का| शायद उसके दिए सस्कांरो का लिहाज रह गया हो|,
माँ का सारा उत्साह रीसने लगा|बेटे की आने की सारी खुशी काफूर होने लगी|
माँ चुप रही| सन्नाटा ज्यादा पसर गया तो बेटा आतूर हुआ कुछ कहने को| माँ की ममता-बेटे से पुछ लिया
बेटा पहले तो हिचकिचाया फिर सीधे मुद्दे पर आ गया|
माँ तेरे रहने का ठिकाना तो यहाँ हो गया है| तु गावँ की पुश्तैनी जमीन बेच दे| गावँ में काैन बार बार सार - सभांल करने जाएगा| इस उर्म में तुझे क्या जरुरत इन सब की|
माँ बूत सी बन गयी| न हिलते बना न कुछ बोलते|दर्द की जो एक टीस उठी तो उसे निःशब्द ही कर गयी|

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