माँ- आखिरी किस्त

ीतीन दिन की मोहलत थी उसके पास|माँ ने शर्माजी को लिया और गाँव रवाना हो गयी | बड़े भाई सा सबंल मिला शर्माजी से|
गाँव पहुँच कर सारे जरूरी काम निपटाये|वकील से सारा सलाह-मशविरा किया| जरुरी कागजात तैयार करे|
सब कर के असीम शातिं मिली
जीवन के अहम मोड़ बन गये से तीन दिन उनके लिए| शर्माजी को कहा कि बेटे के आने पर उनके पास बने रहे|जो कभी इन हालातो से गुजरा नहीं कैसे उसका सामना करने की ताकत लाए|
बेटी आया तीन दिन बाद|माँ ने कागजात कर दिए उसके आगे| बेटे को अजीब लगा|ये काम तो उसका था|उसे लेने थे माँ के हस्ताळर| खैर छुटकारा मिला सारी दौड़ भाग से| उसने कागजात खोले| अपने ही हक में सब होने की निश्चिती ले कर|
ये क्या उसकी आखेँ फैल गयी कागज के उस टुकड़े को देख कर|
माँ ने सारी चल-अचल संपत्ति trust को सौंप दी थी सार- सभांल को जब तक उसका पोता २१ साल का न हो जाए| वो भी तब जब दादी की देखभाल की पूरी जिम्मेदारी ले और उसे पूरा करे|trustको ये अधिकार दिया गया कि वो इस तरफ सतुष्टं  होने पर ही पोते को जायदाद सौंपेगा|
बेटे को हालत देखने लायक थी| ऐसे किसी भी फैसले की उसे उम्मीद न थी|हालात उसके काबू में नहीं थे|कुछ और कह देना का साहस भी उसे नहीं हुआ| क्या पता जो उसके बेटे के हिस्से आना है उससे भी हाथ धो बैठे|
माँ खुश थी अपने फैसले पर| आज भी उसने ही सारा फर्ज निभाया|

                        इति

CONVERSATION

0 comments:

एक टिप्पणी भेजें

Back
to top