विश्वास

विश्वास
  
   "माँ, आज फिर ऊपर वाली आंटी ने सारा कूड़ा हमारे घर के आगे झाड़ दिया|"श्रेय गुस्से में था|"अभी मैं सारा कूड़ा बटोर उनके घर के आगे डाल आता हूँ|"
माँ ने धीरे से कहा,"तुम भी वही करोगे जो उन्होंने किया,फिर दोनो में अंतर क्या रहा?उनकी करनी उनके साथ हमारी हमारे साथ|"
    श्रेय सहमत नहीं था,पर चुप रहा|तीन-चार दिन बाद कूड़ा झाड़ना कम होते होते बंद हो गया|श्रेय ने धैर्य रखे रहने का नया सबक सीखा|
      आज श्रेय का बाहरंवी का परिणाम आया है|उसकी कड़ी मेहनत ने उसे अपने स्कूल में पहला स्थान दिलाया|बधाईयों का तांता लग गया पर उसके सबसे अजीज दोस्त, जिसकी उसने हर संभव मदद की,कोई संदेश नहीं आया|श्रेय को क्षोभ और  दुख हुआ|शायद क्षोभ ज्यादा|माँ ने उसके उतरे चेहरे की वजह पुछी तो श्रेय ने माँ के आगे अपना मन खोल दिया|
"तुमने फोन किया?"माँ ने पुछा|
"मैं क्यों फोन कँरू?"
  "इसका मतलब तुमने उसके लिए जो किया,उसका मुआवजा चाहते हो|चाहे वो उसकी ओर से किया फोन कॉल क्यों न हो?"
"माँ ये कैसी बात कर रही है आप?"माँ ने श्रेय का मन पढ़ लिया था|
"क्या पता सामने वाला किस परिस्थिति में हो?"
माँ की बात मान उसने मंयक को फोन करा|
"यार!!बधाई देने में इतनी कंजूसी"श्रेय अपने को रोक नहीं पाया|
"पापा हास्पिटल में है|कल रात अचानक तबीयत खराब हो गयी|अकेले सब देखना था इसलिए फोन नहीं कर पाया|तुझे बहुत बधाई"मंयक के स्वर में उदासी भरी थी|
  "इतना सब हो गया और तु मुझे अब बता रहा है|इतना पराया कर दिया तुने तो|चल अब जल्दी बता हास्पिटल का नाम|मैं आ रहा हूँ|किसी भी चीज की जरुरत हो तो मैं हूँ|"कह श्रेय ने फोन रख माँ को गले लगा लिया|
"माँ, यू आर ग्रेट"!!!तुमसे बात कर हमेशा मेरा मन हल्का हो जाता है|"श्रेय का सारा क्षोभ धुल गया|
माँ ने भी मजाकिया लहजे मे कहा,"बेटा मैं तो एक और बात भी हमेशा कहती हूँ|"
"हाँ,मैने ये बाल धूप मे यूँ ही नहीं सफेद किये|"कह दोनो हंस देते है|"
श्रेय दरवाजे की ओर बढ़ते कहता है"माँ मैं हास्पिटल जा रहा हूँ मंयक के पास|आकर पूरी बात बताता हूँ|"
  माँ खड़ी श्रेय को जाते देखती है|माँ के विश्वास की आज फिर जीत हूई है|

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