राहे है जुदा

राहें है जुदा


बहुत अजनबी,तन्हा सा लग रहा है यह शहर
यह किस्सा तब का है, जब तुम हिस्सा न रहे
न मेरे न इस शहर के।

हाँ रुठी थी मैं बातों से तुम्हारी
तुम्हारी बातें जो बींधती थी 
गरम सलाखों सी जो पिघला जाती थी 
मेरे कानों के कोमल पर्द पर मेरी कमजोर याददाश्त
भूल जाती थी वह सब
जब तुम्हारी परवाह के नर्म फाहें सहला जाते थे फिर मेरा मन

इधर तुम बहुत बदल गये थे
तुम्हारी शब्दों के तीर तो बींधते रहे
पर तुम्हारी परवाह सुप्त रही
नदी के रुके पानी की तरह हमारा रिश्ता सड़ने लगा 
लगा कि कुछ छटपटाहट है तुम्हारी
 इस रिश्ते से अलग हो जाने की
यह रिश्ता जो गल गया 
अब तलक एक आस, जो रोशनी भर रही थी
नीरवता में लिपट, बुझ गयी थी।
बस उसी दिन से,एक उसी दिन से 
वो मर चुका हिस्सा कोई लौ जला न पाया
हमारे बीच चौड़ी हो रही दरारों पर
बना न पाया कोई पुल।

उस दिन से यह शहर अजनबी हो गया है बहुत
यह घर , इसकी दीवारें पहचानती ही नहीं मुझे
जिनको सजाने में मैंने दे दिये
अपनी जिदंगी के आधे हिस्से
इतना परायापन मैंने कभी नहीं चाहा था अपने लिये
और फिर तुम भी तो, न रह कर भी
बहुत बसे हो हर कही
तुम्हें हर जगह से खुरच कर कैसे निकालूँ
बस यही तुम बता कर नहीं गये।


तुम्हारे बिना जीना बहुत रुखापन लिये है
पर मन अब घुटता कम है बराबर लगती चोट
बहुत बहुत मजबूत बना गई है
बस अब इंतजार है कुछ ओस की बूँदो का
जो गिरे मेरे सूखे जीवन में
और भरे नमी ,मेरे दग्ध ह्दय में।

अंजू निगम
देहरादून



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