खानदानी
इस हवेली ने बहुत अच्छे दिन देखे थे। पूरी रौनक बसी रहती। हवेली की बैठक ,शहर के रुतबेदारों से आबाद रहती। मियां के रंग खूब जमते। शायरी-मुशायरों के दौर चलते और मियां वाह वाही बटोरते। उनका रुतबा ऐसा रहा कि कोई महफिल उनके बिना जमे नहीं। शार्गिद हाजिरी बजाते। मियां के दम ही तो सबकी रोटी जुट रही थी। पैसों की आमद पर कोई बंदिश थी नहीं। तभी की ये हवेली खड़ी थी। मियां का अगर वो दौर था तो बेगम भी नजाकत के झूले में झूलती थी। सेवा में दो खिदमतगार लगे रहते। रसोई दो खानसामों की संभाल में थी। खानसामे भी ऐसे की बड़े से बड़े बावर्ची रश्क कर जाये। कुल मिला कर मियां-बीबी जन्नत की सैर पर थे।
बाद में वक्त ने कुछ ऐसा फेरा डाला कि मियां उसके खासे लपेटे में आ गये। वक्त ने मुँह फेरा तो शार्गिद भी किनारे हो गये। कुछ अल्लाह को प्यारे हुये और कुछ दुसरे रईसजादों की मिजाजपुर्सी में लग लिये। कभी कभार ही ऐसा होता कि कोई पुराना खिदमतगार, आ उनके जख्मों को सहला देता और दो चार दिनों की रोटी का ठिकाना कर जाता। उन खिदमतगारों के खून में अभी भी लिहाज़ की लाली बची थी। वरना अपनों ने तो कब का जुदा कर ही दिया था।
मियां अक्ल के बहुत कच्चे थे, गाने-बजाने में रमे रहे। दुनिया की नब्ज न पकड़ पाये, नहीं तो ऐसे वक्त के लिए दो पैसे जरूर जोड़ कर रखते। हाँ, बेगम को गहनोंं का शौक ज्यादा था। काफी जोड़ भी रखे थे। मुरकी, बूँदे, हँसली, गुलबंद, करसली, बैंदा और जाने क्या क्या। सौ फीसद खरे । शुरु में तो इन्हीं गहनों ने उन दोनों को उसी रुतबे में रखा पर धीरे धीरे वह भी खत्म होने की कगार में आये, तब बेगम के दिमाग में वज़न पड़ा।
इधर बब्बन बराबर हवेली के चक्कर लगा रहा था। फितूरी दिमाग का आदमी। आँख-कान बाकायदा कुछ टोहते। उनकी बदहाली बब्बन की नजरों में उतर गयी थी। घाघ था, जानता था, मियां जीते जी इस हवेली को अपने से अलग न करेगेंं। इसलिए उसने बेगम को घेरना शुरू किया।
मन ही मन बेगम ने कुछ मंसूबे तैयार किये। उन्हें इल्म तो था कि यह गहने भी खत्म हुये तो दाने दाने को मोहताज हो जायेगे। जब वक्त हमारा न रहा तो इंसान कि क्या कहे!! कौन , कब मुँह फेर ले ? आज जो लिहाज़ में आ भी रहे है, क्या पता कल वह भी दामन छोड़ देंं!!!
वैसे बेगम ने अब अपने मुँह पर ताला जड़ लिया था, खुलता तभी जब चूल्हे की आग ठंडी हो बुझ ही जाती। मियां पर काहिली का ऐसा रंग चढ़ा था कि लाख कोसने पर भी बेगम उन्हें अपनी जगह से हिला न पाती। उस दिन भी चूल्हे की आँच मंद हो रही थी कि मियां की हुंकार आयी।
" बेगम, जरा कोयले डाल हुक्के को सुलगा दो। आँच एकदम ही मंद पड़ी है।"
बेगम तो भरी बैठी ही थी,बस जरा आँच उमेठे जाने की कसर थी। उसकी जुबान कोयला हो गयी और वो कुढ़ कर जल उठी," आपके हुक्के की आग बदस्तूर रहे। चूल्हे जले, भले अरसा हो जाये।रत्ती भर खबर है आपको? सारे दिन पड़े खटिया तोड़ते है, कोई ढंग का काम कर, दो पैसे लाने की कब सोची है? गैरत एकदम दफ़न कर आये है। हफ्ता हो गया कोई दहलीज लाँघने तक न आया और एक आप है ख्वाबी महल ही बनाने में लगे है। अजीज़ आयी ऐसे जीवन से।"इससे आगे बेगम की जुबान और जहर न उगल पायी। मियां का शरीर पहले ही समय के बहुत झटके झेल चुका था। कहीं उसकी काली जुबान का कोई करारा झटका उनको जमींदोज ही न कर दे। आखिर जो ऐशों आराम मिले, वो मियां की ही तो बदौलत। वे भी अगर कुच कर गये तो जो जिदंगी का एक दीया लपलपा रहा है वो भी बुझ न जाये। जल्दी से उन्होंने मियां की जिदंगी की दुआ माँगी।
वैसे बेगम भले मियां के लिये नरम पड़ी हो मगर मियां वाकई गैरत बेच के ही पड़े थे। बेगम की ऐसी कड़वी जुबान भी उनके खून को नहीं उबाल पायी। वक्त ने उनके हौसले एकदम सुला ही दिये थे। मेहनत करना उनकी फितरत में था नहीं। न उनका"खानदानी" ठप्पा उनको काम करने की इजाज़त देता था। बेगम के जेवरों की खबर उनकी नाक ने न सूंघी हो, ऐसी सूरत भी कम ही थी। शायद इसी मुगालते ने उनको अपनी जगह से हिलने न दिया हो।
पर आज के फांके ने मियां को हिला दिया। रात भी जब वही हाल दिखा तो बैचेन हो उठे। कुछ हरकत में आये। इतने दिन का खटिया से जुड़ा उनका शरीर अपना ही तौल न उठा पा रहा था। ऐसे में काम कौन सा पकड़ते? न कभी मुनीमी में रहे, न मुंशियों के साये में पनपे। हाँ, पढ़ने- पढ़ाने की कोई जगह बनती तो खींच-खाँच कर वह भी कर लेते। पर उससे गुजर मुश्किल थी।
बेगम का शरीर भी अब पायताने ही खड़ा था। पर जब तक खड़ा था, बसर के लिये रोटी तो जुटानी ही थी। मसला दरअसल मियां की समझाइश पर ही अटका था अब तक। बेगम अकेले होती तो कब का हवेली का सौदा सुलटा, अलग हो लेती। पर मियां की हवेली की एक एक ईंट पर जान बसती थी।
यूँ तो मियां का अब इस मोहल्ले से मन हट ही गया था। इस मोहल्ले में कभी उनका नाम चमकता था। और ये मोहल्ले वाले आँख मिला कर बात करने की हैसियत में न रहते थे। अब देखो, कैसे नाशुक्रोंं की तरह हवेली के आगे घर फैला लिये। गोया, अब बराबरी में उतर रहे हैंं।
"बेगैरत,बेहया,अपनी औकात से ज्यादा सोच रहे है।" मियां इन सवालों से ही जुझते रहते।
दूसरे रोज़ हवेली की नुमाइश के लिए किसी बड़े अमीर का बाशिंदा आने वाला था। बब्बन ही लाता पर आज बब्बन के पास पहले से बेगम को इत्तिला करने तक का ज्यादा मौका न रहा। सो, बब्बन ने समय का लिहाज़ न कर सुबह ही मियां का दरवाजा पीट दिया। बेगम इस बात का खासा ख्याल रखती थी कि बब्बन आने से पहले उन्हें इत्तिला जरूर करे ताकि फिलहाल तो मियां के कानो तक हवेली की खरीद फरोख्त की बाबत कोई खबर न पहुँचे। सुबह इस बेकद्री से दरवाजा पीटे जाने से मियां भी खासे उखड़ गये और खुद ही लहराते ,जाकर दरवाजा खोल खड़े हुये। सामने मियां को देख बब्बन भी हकबका गया। और बब्बन को देख मियां के दिमाग के सोये तार जुड़, जल उठे।
" अलसुबह यहाँ क्या कर रहे हो? किसको बेघर करने आये हो?" मियां उखड़े से बोले।
" अरे मियां!!! आप भी कैसी बात कर रहे है। वो बेगम से कुछ जरूरी बात करनी थी तो सोचा अभी बता आये।"
" बड़े नाशुक्रे हो बरखुरदार, मालिक मकान सामने खड़ा है और तुम बेगम को घेर रहे हो।" मियां इतने ज़हीन निकलेगें,बब्बन तो इस अंदाजे में ही न थे।
उधर जब बेगम निकल कर आयी, बब्बन और मियां को रु-ब-रु देखा तो हैरान हो गयी।
मियां की नजर जब बेगम पर पड़ी तो उबल पड़े," इस नामाकूल की तो हैसियत न थी यहाँ कदम रखने की। मगर आज मेरी ही बेगम ने सरेआम मुझे नीलाम कर दिया। मेरे दफ़न हो जाने तक तो इंतजार किया होता ।"फिर बब्बन की तरफ रुख कर बोले," दफा हो यहाँ से। दुबारा हवेली का रुख न करना, कमबख्त कहींं का।"
बेगम उनकी ऐसी बेकद्री करेगी, इसका उन्हें जरा़ गुमान न था। आज बब्बन जैसे शातिर की इतनी हिम्मत हो गयी कि वो उनकी हवेली का रुख कर गया। उनके मन का एक बड़ा हिस्सा जैसे भरभरा कर आज गिरा । उन्हें लगा अचानक हवेली की दीवारें एकदम झीनी हो उठी है। मियां वहींं पड़ी कुर्सी पर ही टिक गये। कल का भुखा शरीर तिस पर बेगम के ऐसे रंग।
बेगम भी एकदम सकते की हालत में खड़ी रही। आज कल करते वो मियां को बताना टालती रही। बता ही देती तो आज का ये ज़लजला न आता जो उन दोनो के बीच के सारे रिश्तों को एकदम बहा ले गया। पीछे छोड़ गया दर्द,नफरत, नाफरमानी का कीचड़। आज तक की उम्र में बेगम ने मियां से कोई बात न छिपायी थी। अब तक की सारी वफा़ बस रुसवाई बन ठहर गयी।
जुबान दोनो की जैसे सिल गयी। अपने दायरों में दोनों सिमटे रहे। सुबह दोपहर में तब्दील हुई तो बेगम को चिंता हुई। अब तक जिन गहनोंं पर मोह जकड़ा था, सोचा आज के आज बेच रोटी का जुगाड़ कर ले। कल की देखी जायेगी। बाजा़र जा सारा सौदा लायी फिर बड़े जतन से खाना बना वह मियां के सिरहाने खड़ी हुई।सहुलियत से बातोंं का सिरा पकड़ सारे खुलासे करने का बेगम मन बना चुकी थी। आज मियां के साथ उनका हुक्का भी वैसा ही बेदम पड़ा था।
खाने को साथ रखी मेज़ पर टिका वो मियां को उठाने चली। पर मियां तो कुच कर गये थे। यह आखिरी सदमा वह संभाल न पाये। वादे के वह पक्के निकले। जीते जी इस हवेली से उन्हें कोई अलग न कर पाया।
बेगम अब भी उसी हवेली में रहती है। गुजर बसर के लिये हवेली की बाहरी बैठक किराये पर उठा रखी है। बब्बन ने बेगम को बहुत घेरा पर बेगम की सख्त हिदायत रही कि इस हवेली की दहलीज में अब वह न दिखे। अपनी जिदंगी के आखिरी मुहाने तक आ गयी बेगम को बस एक मलाल रह गया है। काश!!! मियां कुछ अफसोस लिये न गये होते।
अंजू निगम
देहरादून
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