दो नज्म

दोनों नज्म


नज्म

हम अपना जख्म दिखाने कहाँ चले आये,
शिकवो की किताब खोले कहाँ चले आये|

वो शाम जब छु रही थी रात की दहलीज,
इस दिल की लगी बुझाने कहाँँ चले आये|

वक्त ने हमे इस कदर कर दिया हैं मजबूर,
खुद से खुद को दूर कर कहाँ चले आये|

दरख्तों को हमी ने कर दिया हैं जमींदोज़,
पंरिदो को बेघर कर हम कहाँ चले आये|

दीवार बने खुद बैठे हैं अपनी ही राहो में,
अपनी ही बिगड़ी बनाने कहाँ चले आये|

गिरह किस कदर उलझ गयी हैं रिश्तों की,
बंधी ये गाँठे खोलने हम कहाँ चले आये|

गैर से रिश्तों की अब क्या करे शिकायत,
अपनो को बेगाना कर  कहाँ चले आये|

अंजू निगम
देहरादून




ये शाम पायल की झंकार के नाम लगती है,
वो मुहोब्बत जो खास थी अब आम लगती है|

किसी झरोखे से झांक रही जो यादे आज,
तासीर वो पुरानी आज  तमाम लगती है|

अपनो में अपनो की तरह ही जिया हमेशा,
अब मेरी हर वफा उन्हें इल्जाम लगती है|

खुद टुट कर बांधता रहा था हर तिनका,
घर की बुनियाद ही अब नाकाम लगती है|

दिल के कितने मौसम सर्द किये उनकी ऐवज,
तेरी ही गली अब तो हमे गुमनाम लगती है|

अंजू निगम
देहरादून

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