भड़क उठी चिंगारी फिर आग से,
सिसक सिसक के सिसकी निकली जब आँख से|

सूखे गुलाब उड़े फिर किताब से,
आज तुम जब गुजरे उसी राह से|

कोयल कूकी फिर उस शाख से,
थपथपाती एक तरन्नुम मेरे कान में|

अबीर घुला फिर उनके गाल पे,
होली का मौसम जो गुजरा आँख से|

कदमो के निंशा फिर देखे रेत पे,
कतरा-कतरा मांझी बह आया जब आँख से|
अंजू निगम
इंदौर

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