एक औरत

खुदा ने सोचा एक नर्म सा अहसास बनाऊँ,
उसे नफासत, नजाकत के पैरहन पहनाऊँ|
तो उसने चाँद से उजाले, शम्स से नूर माँगा,
धरती से सब्र,मौसम में सावन माँगा,
सगुफ्ते से जान-ओ-अमान,मिट्टी से मूरत माँगी,
पखुँरी से रुप,फूलो से रंगत माँगी,
रात से काजल,दिन से रोशनी माँगी।                           नदियों से लचक माँगी,शबनम से आँसू,
झरनो से शोखी माँगी,आईने से सीरत ,
शाम से हया माँगी,मोती से आबरु,
शजर से हौसला माँगा,शाखो से जूड़ना

तामील हुई तब एक सूरत औरत सी
मगर खामी भी बहुत रह ही गयी

दूनिया ने बंदिशें दी, रिवाजो ने जंजीरे,
गलत नजर सियारो सी मिली,दर्द टुटे पत्तो सा,
खामोशियाँ तस्वीरो ने मयस्सर की,
क्या फिर औरत एक  लाचार,बेकस,बेबस बन गई?

नहीं
उसने बिजली से आवाज ली
तरकश से चुभना,
बादल से विस्तार,
पंछी से उड़ान ली

अब औरत ने एक संपूर्णता ली
एक पूर्ण संपूर्णता

अंजू निगम
इंदौर

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