सुबह से बिरजू का इंतजार करते अब उठी हूँ जब अंधेरा घिरने लगा हैं|
पता नहीं इधर हर काम को करने का बीड़ा तभी क्यों उठाती हूँ जब अंधेरा घिरने लगता हैं| अब अक्सर यही होता हैं|जानती भी हूँ कि अंधेरे में चीजे समझ नहीं आयेगी, पर ये मेरी आदत बन रही हैं|
जबसे श्वेता गई हैं, मेरे मन में यही उठा-पटक चल रही हैं|पति ऑफिस और घर पर टी.वी में आती डिबेट में ही उलझे रहते |वैसे भी उनसे मेरे मन का छत्तीस का ही आकंडा रहा हमेशा| किसी बहस में पड़ना या बातो की गहराई में उतर उसे कुरेदते जाना मुझे नापंसद था|
"माँ,इस बार आपको नया मोबॉइल दिला दूंगी|"श्वेता ने ये कह मुझे एक और सिरदर्द दे दिया|
"रहने दे| मुझे ये ऐंड्रॉयड के चोचंले समझ नहीं आते| बात ही तो करनी होती हैं बस|" मैंने अपनी जिद्दी बेटी की इस बात को सिरे से खारिज किया|
"ठीक है, फिर कुछ पता करना हो तो अपने आप खोजना| मैं बिल्कुल साथ नहीं दूँगी|" उसका यही अंतिम हथियार होता जिससे मैं हमेशा बींधती|
"ठीक है मगर अपटेड कर देना|" मैंने हामी भरी|
"मैं क्यों, आप क्यों नहीं अपटेड कर पायेगी| सब मोबॉइल में लिखा होता हैं|" बेटी एक और तीर छोड़ती|
"मुझे कुछ पता नहीं फिर कैसे?"
"आप बहुत जल्दी हार मान लेती है|कुछ परेशानी होगी तो मैं हूँ न|" श्वेता मुझसे क्या चाह रही थी,मेरी समझ में आ रहा था|
आकर उस कड़क अध्यापिका ने मोबॉइल भी खरीदा और मैंने ही सारा अपटेड भी किया, बच्चों सी किलकारी भी गुंजी,जो श्वेता की नहीं मेरी थी|
कल मेरी इसी अध्यापिका ने एक पोस्ट मेरी सामने रख दी| "ये क्या है"?
"आप इतना अच्छा लिखती हैं|अपने खाली समय में फालतू की सोच लाने से अच्छा यहाँ अपनी कहानियां भेजे|"
"पर मोबॉइल में मैं नहीं लिख पाऊँगी| ये मेरे बस का नहीं|"मैंने पहले ही हार मान ली|
"आपसे सब हो जायेगा| मैं हूँ न!!!" अध्यापिका पाठ सिखाने के लिए तैयार खड़ी थी| फिर मैं अपने कदम कैसे पीछे लेती|
जब पहली कहानी भेजी और मनभावन टिप्पणी मिली तो मैं अपनी इस "ऐंड्रॉयड गुरु" के प्रति नतमस्तक हो उठी|
कल ही वो मुझे फोन पर छेड़ रही थी,"क्या बात है माँ आप तो अपने गुरु को भूल गयी| एक हफ्ते से आपका कोई फोन नहीं आया| और मैं चहकते हुये बता रही थी कि तीन जगह से मुझे कहानी भेजने का प्रस्ताव मिला हैं|"
अंजू निगम
इंदौर
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