संघर्ष
शलभ एकटक सामने रखे पेपर को देख रहा था| शुभा की बड़ी सी तस्वीर के साथ ये केप्शन"मध्यप्रदेश की उभरती गायिका, जिसके कंठ में सरस्वती का वास हैं"|
पिछली रात बेटी ने माँ के इसी कार्यक्रम का दूरदर्शन से सीधा प्रसारित होने की बात बतायी थी| शायद केवल उसको बताने भर के लिए कि अब माँ को आपके सहारे की जरूरत नहीं, वो खुद अपना रास्ता बना चुकी हैं|
शलभ को याद आया कि इसी कार्यक्रम में हिस्सा लेने के लिए शुभा इस बार एकदम अड़ गयी थी और मानसिक ढाल बनी थी उसकी बेटी|
"नहीं जाना हैं तुम्हे कही| पहले अपना घर संभालो| क्या मिरासियो की तरह हमेशा ढोलक-तबले में लगी रहती हो|"शलभ ने अपना निर्णय सुना दिया था|
" घर बहुत संभाल लिया|अब अपने को संभालना हैं| इस बार मुझे इसमें हिस्सा लेना ही हैं| मिरासी ही सही, लेकिन अपने नाम पर|"
"ठीक, तो आज से केवल शुभा बन कर ही जियो| पर इस घर से नहीं| "
शुभा ने फिर एक शब्द नहीं कहा| बस,सामान और बेटी को ले घर के बाहर हो ली|
"माँ ने भी वही संघर्ष जिया जो मैंने कितने सालो तक जिया|अगर मुझे बेटी का मानसिक सहारा और ये मंच न मिलता,जो नये कलाकारों को आगे बढ़ाते हैं, तो आज मैं भी माँ की तरह गुमनामी की राह पर होती| धन्यवाद इस मंच को जिसने मुझे शुभा बन कर जीना सिखाया|"शुभा दूरदर्शन के उस कार्यक्रम में बहुत निडर हो बता रही थी| कही भी शलभ का कोई जिक्र नहीं|
ताली की गड़गड़ाहट के बीच शुभा का चेहरा आत्मविश्वास की नयी आभा से दमक रहा था|
अंजू निगम
इंदौर
0 comments:
एक टिप्पणी भेजें