दीवाली
बात उन दिनो की हैं जब मेरे पापा की जबलपुर में पोस्टिंग थी|
मैंने बड़े शौक से कांजीवरम रेशमी लंहगा मँगवाया था| पूजा के बाद हम बच्चो की टोली नीचे एक फ्लैट(खाली पड़ा था) के आगे पटाखे जलाने के लिये इकट्ठा हुये| एक बच्चा जो केवल हम पर रौस गाठने के लिए पटाखो का पूरा असला उठा लाया|
नीचे जाने से पहले माँ ने मुझे लहंगे की जगह कुछ और पहन लेने की ताकीद भी की| पर अपना नया लहंगा सबको दिखा देने का जो फितूर था,मुझ पर भी सवार था| माँ ने भाईयों को ताकीद की कि जरा इस लड़की को पटाखो से बचाये रखे|
बस जी हम सब पटाखे जलाने में मशरूफ हो गये|उधर उस बच्चे ने पटाखे रखे एक तरफ और थोड़ी दूर हट कर चरखी चला दी|बस फिर क्या था, चरखी की एक चिंगारी ने वो कर दिखाया जो वो (बच्चा) दो दिन में कर पाता|
सारे पटाखो ने एक साथ आग पकड़ ली|एक रॉकेट मेरे लहंगे को नीचे से जलाता पार चला गया| मैं बाल-बाल बच गयी|
मुझे बेहद अफसोस हुआ कि मैंने माँ की बात नहीं रखी जिसका खामियाजा मेरे लहंगे को उठाना पड़ा|
अंजू निगम
इंदौर
#साहित्य-सागर
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