प्राजंल ने सारी बात विवेक के सामने रख दी|
विवेक ने प्राजंल से पुछा,"अब आगे क्या?"
प्राजंल ने कहा,"आगे वही जो ईश्वर को मंजूर|"
विवेक के आगे दो रास्ते थे|एक वो प्राजंल से आज्ञा ले चुपचाप निकल जाये|फिर कभी इस रास्ते की ओर न बढ़ने के लिये
लेकिन वो ऐसा कर सकता था क्या?प्यार किया था उसने प्राजंल को|ऐसे कैसे बीच मझधार पर छोड़ दे| अब तक तो वो यही सोचे बैठा था कि प्राजंल अपने परिवार में खुश होगी|पर उसे जरा अहसास न था कि वो प्राजंल को इस हलात में देखेगा|
अब जो सोचना उसे ही सोचना था|उसे मालूम तो था कि निर्णय लेने में ज्यादा देर की तो वो पशोपेश में पढ़ जायेगा|
विवेक प्राजंल के सामने आ खड़ा हुआ|
"तुम चाहो तो मैं जिदंगी भर तुम्हारा हाथ थामने को तैयार हूँ|मैं तुम्हारे ऊपर दया करके ये निर्णय नहीं ले रहा हूँ|बल्कि मैंने तो केवल तुमसे प्यार किया था|केवल तुमसे|आगे तुम जो निर्णय लो मुझे मंजूर हैं"
प्राजंल हैरान हो विवेक की ओर देखने लगी,"विवेक तुम्हे अहसास भी हैं कि तुम क्या कह रहे हो?मैं एक विधवा हूँ|और ये समाज एक विधवा के पुनः विवाह की मंजूरी कभी नहीं देगा|"
"तुम किस जमाने की बात कर रही हो?क्या वो जमाना आ तुम्हारी रोटी का जुगाड़ कर देता हैं?और अब वो जमाने भी नहीं रहे जब विधवा का पुर्नविवाह वर्जित माना जाता था|अब तुम ऐसी कोई सोच न रखो|अभी पूरी जिंदगी पड़ी हैं तुम्हारे आगे|"
प्राजंल सोच रही थी,"विवेक ने सच तो कहा| पापा के चले जाने के बाद किसने परवाह की उन माँ-बेटी की?पर मैं माँ को ऐसे हालात में अकेला कैसे छोड़ दूं?"
"इतना किस सोच में डुब गयी?माँ के लिए परेशान न हो|वे हमारे साथ ही रहेगी|"विवेक जैसे प्राजंल का मन पढ़ गया|
"मेरा साथ मंजूर हैं?या कोई और हुक्म"विवेक ने माहौल को हल्का बनाने के लिये कहा|
प्राजंल की आँखे भीग उठी|और उसने विवेक का हाथ थाम लिया|
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