तीसरी किस्त

आरती ने बहू के आगे आलते की थाली रख दी|बहू का गृह प्रवेश हो गया|इतना मे बाहर से दूध वाला ने हांक लगायी|
"ओssssमाई,तनिक भगोना जल्दी बढ़ाओ|वैसा ही आज बड़ा देर.हो गया|कैसा दिन चढ़ आया हैं!!!लौटते बखत खुब देर हो जायेगा|"
   आरती चिढ़ी थी ही,"का टेर लगाये जा रहा हैं|दरवाजे बैठ जाये का कल से?बुड़बक कही का|देर तो हम सब ही को हो गया हैं|"
विमल स्नेहा को कमरे लिवा ले गया|
इधर स्नेहा सोच रही थी,"गजब हैं माई!!सबका हां लेती हैं"
उधर आरती का माथा भिन्ना रहा था|"बहू तो आ गई अब जहान में क्या लीपापोती करेगी?छोटा बाबू आये मूढ़ जात!!का फायदा होगा कुछ भी पूछने का भी|"
  खानदान के और लड़कन-बच्चन में तो आरती बड़ी ठसक से नेग लिये रही|अब लौटाने के बखत ये बवाल!!खानदानी फुफा-जीजा तो उठते-बैठते विमल की शादी का हलकारा भेजे रहते हैं|एक आध तो आगे-पीछे सुभीता दे गये,"भोईजी,लड़कन का सेहरा कब उतार रही?सर्दी उतर रही हैं|इस बार तो बढ़िया कोट-पैटं का सहारा हो जातो|"
    तब आरती भी ठसक मे रहती,"कोई अच्छा लड़की तो सुझाईये|"
का-का आस जोहे थे|बैंड-बाजा,ढोल-बताशे,जीजा -साली का नोक-झोंक,नेग-शगुन सब न ठंडे बिस्तर मा चला गया|आरती का जी तो आया कि अभी विमल को बुला उसका फलीदा बनाये|
"ये कौन शादी हूआ?लड़की हाथ झुलाते चली आई?हमारा लड़का का देखा ऐसा ढ़ेर फुट का लड़की मे!!इतना रिश्ता बैठा था सब मिट्टी मे लीप दिया!!!!
    आरती दोपहर तक इसी उधेड़बुन मे बैठी रही|छोटा बाबू दो बार आ खाने का पूछ गये|
   जब शाम ढलने को हूई तब आरती उठी दिया-बाती करने को|
  इतना मे एक लंबी गाड़ी आ कर रूकी आरती के घर के आगे|उससे उतरे लोग खानदानी लग रहे थे|आगे बढ़ जब उनका परिचय मिला तो आरती  हकबका गई|वे स्नेहा के माँ-बाबू थे|आरती से ज्यादा वे स्नेहा पर कुपित थे पर बात संभालने का वजह आये थे सब तय करने|
"अपना घर का हाल तो बहुत ही बेकार हैं|इनका आगे|"
    आरतीसोच रही थी और देख रही थी लाईन से लगे फल-मावो का डलिया|
    सुबह का सारा ऊहापोह शाम ढलते धुल गया था|पीछे छुट रहा सारा रौनक फिर नया रूपमे लौटने वाला था|
    आरती की आँखो से विमल के लिये स्नेह बरस रहा था|

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