वो अश्क बन मेरे चश्मे-तर में रहता हैं,
अजीब शख्स हैं पानी के घर में रहता हैं|
सुपूर्द करके उसे चाँदनी के हाथो ,
लौट जाऊँगी मैं अपने घर के अंधेरो में,
न मिलता तो बरबादी के
अफसाने कहाँ जाते,
अगर दुनिया चमन होती तो
वीराने कहाँ जाते|
वो अश्क बन मेरे चश्मे-तर में रहता हैं,
अजीब शख्स हैं पानी के घर में रहता हैं|
सुपूर्द करके उसे चाँदनी के हाथो ,
लौट जाऊँगी मैं अपने घर के अंधेरो में,
न मिलता तो बरबादी के
अफसाने कहाँ जाते,
अगर दुनिया चमन होती तो
वीराने कहाँ जाते|
0 comments:
एक टिप्पणी भेजें