अंतिम भाग-दूसरा अंक

अस्पताल का ही एक मरीज( उसे भी मुँह का कैंसर था) गुटखा के अभियान की शुरुआत की| अब वो तकरीबन इस बीमारी से छुट चुका था| उसे देख मुझमें एक नया जोश भरता कि जब ये ठीक हो गया तो पापा भी ठीक हो ही जायेगा|
          जिस "सपोर्ट ग्रुप" से मुझे पापा का ऑपरेशन करवाने के लिये मदद मिली थी उससे मुझे एक नयी सीख और जीवन को एक नया मकसद मिला|
       कितने ही मरीज और उनके परिजन, जो हर तरह से टुटे और हर जगह से न सुन कर यहाँ आते, उनकी सार- संभाल  यही "सपोर्ट ग्रुप" करता| लंबी बीमारी से लड़ते मरीजो को मानसिक संबल देना इस ग्रुप का काम था| पापा के मन को मजबूत बनाने और आने वाले दिनो की परेशानियों का डट कर मुकाबला करने के लिये कितने ही बार इस ग्रुप के सदस्यों ने  पापा के साथ सिटिंग की|
           सारी उम्मीदों को तोड़ते और अपनी बीमारी से जुझते पापा ने उस दिन मौत के आगे हार मान ही ली| लौ बुझने से पहले पूरी तेजी से जलती हैं| जाने से पहले पापा घर जाने को बहुत बैचेन रहे| मुझे उठ कर दिखाया कि अब मैं बिल्कुल ठीक हूँ और घर जाने के लायक हो गया हूँ| जिद कर उन्होंने बाहर जाने के लिये पैंट-शर्ट खुद पहनी| उनका चेहरा का तेज देखते बनता था|
      दूसरे दिन डा. से मिल कर उनको घर ले जाने को मैंने मना लिया| पर इसकी नौबत नहीं आयी| उसके पहले ही पापा इहलोक में विलीन हो चुके थे|
   उम्मीद जगा कर आये इस नतीजे ने मुझे अंदर तक झकझोर दिया था| पापा के खाली बिस्तर  ने मुझे मुक कर दिया|
     उस दिन पापा को सामान समेट मैं घर रवाना हो गया पर बिना पापा के बिना घर पर मन नहीं लगा| मैं वापस आ "सपोर्ट ग्रुप" में शामिल हो गया|
        उन आंटी की तरह मैं भी हर मरीज में अपने पापा की छवि देखता हूँ|काम में मैंने अपने को इस कदर झोंक दिया कि रात को बिस्तर पर जाते ही नींद  घेर लेती हैं| पापा के कमरे का रुख उस दिन के बाद से नहीं कर पाया| इस बात की हिम्मत मुझ में नहीं आ पायी|
        ईशान की तरह मैं भी लोगो से पान-मसाला, गुटका न खाने की अपील करता हूँ| इस अभियान को अब मैंने अपने जीने का मकसद बना लिया हैं| ताकि कोई इसके चलते अपना इष्टजन न खोये|

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