आज एक उक्ति के साथ मैं अपनी बात शुरु करती हूँ|
" मन का सकंल्प और शरीर का पराक्रम यदि किसी काम में पूरी तरह लगा दिया जाये तो सफलता मिल कर रहेगी|"
सुबह की जुटायी शक्ति रात ढलते-ढलते काफुर हो जाती| रात अपने साथ वही अंधकार और बेबसी साथ लाती|रात को पापा असहनीय दर्द की पीड़ा से छटपटाते और मैं बेबस सा उनका दर्द किसी तरह कम करने का भरसक प्रयत्न करता| अपनी बेबसी में मैं खुन के आँसु रोता|
नाइट शिफ्ट में काम करने वाली नर्स को मैंने जितनी बार आवाज लगायी वो आयी|और तब तक रुकी जब तक पापा का दर्द कुछ कम न हो जाता| मुझे कभी उनके चेहरे पर कोई शिकन न दिखी|
अपने इस अस्पताल प्रवास के दौरान मैंने मानवता की ऐसी मिसाले देखी कि मैंने खुद एक स्वयंसेवक बन जाने की ठानी| एक कम उम्र लड़का अपने पापा को खो देने के बाद यही लोगो की सेवा करने के लिये रुक गया|
एक आंटी ने यहाँ अपनी बेटी को खोया| अब वे मरीजो के बीच रह उनका हौसला बढ़ाती |वे सारे मरीजो को चाकलेट बांट दिन की शुरुआत करती|
मेरे डा. का काम आसान न था| वे सुबह ८ बजे अस्पताल में होते| और ८.३० तक ऑपरेशन थियेटर में|
ऑपरेशन थियेटर में गहमा-गहमी का ये दौर करीब ७.३० तक चलता| दो दिन डा. अस्पताल में कैंसर के प्रति जागरुकता फैलाते|
पापा की बीमारी ने कितने ही अपने ढुंढ निकाले| एक तो मेरे डा. ही थे| पापा को ऑपरेशन के लिये कहा गया था पर उसके लिये मेरी जेब में पैसे न थे| दो-तीन दिन की लगातार गुहार के बाद आखिर को मैंने डा. से कह ही दिया कि" डा. मैं अब ऑपरेशन करवा पाने की स्थिती में नहीं हूँ|"
डा. ने तब अस्पताल में ही बनाये गये" सपोर्ट ग्रुप" जो वहाँ उन मरीजो द्वारा बनाये गये थे जो अब ठीक हो गये थे| मेरी समस्या हल हो गयी| ऑपरेशन के बाद डा. मेरे पास आये| पापा को फिलहाल काफी आराम था|
डा. ने कहा," बस, अब अपने पापा को वॉक पर ले जाओ| ये एकदम ठीक हैं|" उस दिन मुद्दतो के बाद मेरे चेहरे पर मुस्कान छिटक आयी थी|
डा. ने पूरी तरह से पापा को कैंसर मुक्त होने की बात नहीं कही थी| मेरे चेहरे से अभी उदासी के बादल छंटे न थे| " तुम अपने पापा को हमारे ऊपर छोड़ दो| खुश रहो| डरो मत, हम हैं न तुम्हारे पास"| डा. के इन शब्दो से मैं तो तर जाता जैसे| अगर मैंने उन्हें ईश्वर मान लिया तो क्या गल्त किया|
पाठको कल अपनी बात कुछ और आगे ले जाना चाहुँगी| मेरे साथ बने रहिये|
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