जो जगह पल्लव ने चुनी थी वो बहुत ही खुबसुरत थी| सारे दोस्तो की टीम नदी किनारे पहुँच चुकी थी| खाने-पीने का सारा इंतजाम किया गया था| वो भी पल्लव की तरफ से|
" एक महीने में दो-दो पार्टी!!! भई, दोस्त हो तो पल्लव जैसा वरना् न हो" सारे दोस्तो के ठहाके गुंज उठे|
नदी का किनारा और आस- पास का नजारा बहुत ही खुबसुरत था|सुमि ने तो केवल किताबो में ऐसी जगह देखी थी| हकीकत में तो आज पाया उसने| इन खुबसुरत नजारो को वो अपनी आँखो में कैद कर लेना चाहती थी| वो बस खो सी गई|
" कैसी लगी ये जगह? मैंने ही ये जगह पसंद की outing के लिये" पल्लव ने पीछे से आकर कहा तो वो चौंक गयी|
" बहुत खुबसुरत जगह हैं" सुमि ने खुश होते कहा|
" बचपन में हम अक्सर यहाँ आया करते थे| सोचा करता था कभी तुम्हें साथ ले यहाँ जरुर आँऊगा|" कह पल्लव ने सुमि की ओर देखा|
सुन कर सुमि असहज हो उठी| पल्लव इतनी साफ गोई से अपनी बात कह देगा| इसका उसे जरा अहसास न था|
सुमि ने इधर-उधर नजरे घुमा कर देखा| दूर दोस्तो की टोली खाने के इंतजाम में लगी दिखी|
" मुझे उनकी मदद को जाना चाहिये|" कह सुमि ने जैसे ही कदम बढ़ाये पल्लव ने उसे रोक लिया|
उसका चेहरा अपने दोनो हाथो में ले बोल उठा|" मेरी जीवनसाथी बनना पसंद करोगी"|
एकदम जंगली की तरह लड़ते दोनो ऐसा मोड़ लेगे सुमि को उम्मीद न थी|
पल्लव ने अपना मन तो स्कुल के दिनो में ही खोल दिया था| इतने सालो में भी उसकी भावनाँए जस की तस थी|
" इतने दिनो यही बात तो मैं तुमसे कहना चाहता था| लंदन जाने से पहले मुझे तुम्हारी रजामंदी चाहिये थी| तुम्हारा जवाब "हाँ" में हुआ तो मुझे बहुत खुशी होगी|" इतना कहते भी पल्लव की नजरे बराबर सुमि पर गड़ी थी|
" हो सके तो मुझे अभी जवाब दे दो| इंतजार करना मुझे बहुत अखरता हैं|" कहते पल्लव के चेहरे पर मुस्कुराहट उभर आयी|
" चाचा-चाची क्या सोचेगे? अपना दुल्हा खुद ही ढुंढ लिया|" सुमि को कोई और जवाब न सुझा तो यही दलील दे दी|
" तुम नहीं, मेरे मम्मी-पापा चाचा-चाची से तुम्हारा हाथ मेरे लिये मांगेगे| पहले तुम हाँ तो कह दो| भई, तुम्हारी हाँ सुनने के लिये भी कितने पापड़ बेलने पड़ रहे हैं" कह पल्लव हंस दिया|
उसके बाद सुमि की हाँ भी हुई और कुछ दिनो बाद शादी भी|
जो"पनौती" का ठप्पा सुमि पर चस्पा था वो इस शादी के बाद तिरोहित हो गया|
सुमि ने नये जीवन की ओर जो अपने कदम बढ़ा दिये थे|
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