तीसरी किस्त

आज सुमि उस 'घर' के सामने खड़ी थी जहाँ कभी उसका बचपन बीता था|जाने कितनी मीठी यादे उसके जेहन में डुब-उतरने लगी| माँ-पापा ने सुमि के जन्मते ही ये मकान उसके नाम कर दिया था|पहले'nominee' की हैसियत से और २१ साल की होने पर मालिक के तौर पर|
     चाची ये बात तो जानती थी कि शहर के बीचो-बीच सुमि का मकान हैं पर उस वसीयत की तह तक वो अब तक नहीं पहुँच पायी थी| ये बात केवल चाचा तक थी| सुमि को भी वक्त से पहले कुछ बता देना उन्हें ठीक न लगा| सुमि का स्वभाव जानते तो थे|
    २१ साल की होने तक सब कुछ उसे सौंप निश्चित हो जाना चाहते थे चाचा| चाची का मन कितना कलुषित था ये वो जानते थे|तिस पर दो बेटियों सामने थी|
   इन सब बातो से दीगर आज सुमि बहुत खुश थी| बचपन की सहेली से बिल्कुल फिल्मी तरीके से उसका मिलना हो गया| अपने पति के साथ वो दो महीने पहले ही इस शहर आ बसी थी| उसका घर सुमि की बुटीक के एकदम पास था सो, सुमि के बढ़िया काम की तारीफ सुन कर ही वो यहाँ खींची चली आयी थी|
" अरे!!!!!! सुमि तुम?" बुटीक पर कदम रखते ही रिया इतनी ही जोर से चीखी थी| इतनी जोर से कि कारीगरो के हाथ के काम छुट गये|
"तु यहाँ?" सुमि भी रिया को देख उछल पड़ी थी|
" यहाँ कब आयी? कहाँ रहती हैं? इतने सालो तक कोई सुध नहीं ली तुने?" सुमि लगातार सवाल दागे जा रही थी|
" सांस ले ले थोड़ी| मुझे भी लेने दे| बुटीक के साथ टीचर भी बन गयी क्या?" रिया हंसते हुए बोली|
" ठहर तो अभी बताती हूँ तुझे" सुमि भी हसंते हुये बोली|
स्कुल के दिनो में चुलबुली रिया-सुमि-मधु की शैतानी तिकड़ी सारे स्कुल में जानी जाती थी| इनके आगे कोई टिक न पाता था| दोनो सखी बैठी तो अतीत के जाने कितने पन्ने खुलते चले गये|
       सुमि का तो बचपन लौट आया था| और आत्मविश्वास भी|

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