चौथी किस्त

बिसरन और बच्चवा के बापू कुछ गांव के लोगो के साथ बिरजू के घर पहूँचे तो बिरजू के ठाठ देख चकित रह गये| मजूरी करने वाले के पास ऐसा ठाठ| बापू का दिमाग पहली बार कुछ अलग सोच पाया| पहली बार उनका माथा ठनका| बच्चवा की माई ने कित्ती बार गुहार लगायी थी पर उसने ही कान न दिये|
      " बच्चवा कहाँ हैं? कहीं नजर नहीं आता?" बापू ने पूछा| जाने क्यों अब उसका मन शंका से भर उठा कि अब बच्चवा बिरजू के पास नहीं रहता| उसकी तनिक भी निशानी नहीं कि वो यहाँ रह रहा था|
बापू के सवाल से बिरजू हकबका गया| यहाँ वहाँ की बाते करने लगा|  तब बिसरन ने दो धौल जमायी|  गाँव वाले साथ न होते तो थोड़ा आराम भी देता बिसरन|
     " हमाऊ का कछु नाय पता| एक दिन हाट का कह जाने कहाँ डोल गया" बिरजू हकला कर बोला|
" का कह रहे हो?डोल गया हाट तो हमें खबर काहे नाहीं किस्स" बिसरन गरज कर बोला|
  दो गाँव वाले आगे बढ़े और बिरजू को दबोच लिया| बिरजू समझ गया कि बताये बिना छुटकारा नहीं|
  उसके बाद बिरजू ने जो बताया तो बिसरन, बापू समेत सारे लोग सकते की हालात में आ गये| शहर आ बिरजू को यहाँ की चकांचौध लील गयी|
" का का सपने पाले रहे और ये हमार बिटवा का निकला" बिसरन  हूलस उठा|
  " इत्ते भर से हमार बिटवा तो वापस नहीं आ सकी| तनिक इस नासपीटे से हमार बच्चवा का पता-ठिकाना तो पुछा" बापू सिर में हाथ धरे बोल उठे| "का जवाब देई हम बच्चवा की माई का"|
  बिरजू  भी मोटी चमड़ी का था| जल्दी बताने को तैयार न हुआ| जब पुलिस में रपट लिखाने की बात हुई| तब कुछ नरम पड़ा|
    बिरजू बहूत देर उनको शहर के चक्कर लगवाता रहा| उसे एक मोटी रकम अपने हाथ से निकलती दिखाई पड़ी|
    मौका देख निकल भागने की बिरजू की आस पूरी न हो पाई| आज वो अच्छा फंस गया था| आखिर को उसको बिसरन और उसके गाँव वालो को उस घर के आगे खड़ा ही करना पड़ा जहाँ बच्चवा काम करता था|

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