अंतिम किस्त

सोनल ने अपने मन की कर ही ली| सुमेर को दुख दे पता नहीं कौन सा आंनद मिलता था सोनल को| सुमेर ने तो टुट कर चाहा था सोनल को और वो सोनल को हमेशा खुश ही देखना चाहता था| पर सोनल का प्यार मात्र छलावा था क्या?
      उस दिन के बाद से दोनो के बीच एक अनकही सी दूरी आ गयी| केवल काम की बातो के अलावा और कुछ नहीं| एक ही छत के नीचे रह कर भी नितांत अजनबी| सोनल ने झुकना सीखा ही नहीं था कभी|
      सोनल को आज अचानक याद आया कि उसे नौकरी पर भी वापस जाना हैं|इस बार उसने सुमेर की सबसे प्यारी चीज उससे अलग कर लेने की ठानी|
     सांची को अपने साथ ले जाने की| लाजमी सी बात थी कि इसका पुरजोर विरोध होना था और हुआ| सांची ने भी पिता से अलग हो माँ के साथ जाना नामजूँर किया| सोनल ने हार जाना सीखा न था| साम, दाम, दंड , भेद सारे हथियार इस्तेमाल कर वो अपना मकसद पुरा कर ही लेगी ऐसा सुमेर भी समझ गया था| पर इस बार बात बेटी पर आ अटकी थी| इसलिए सुमेर ने  ठान लिया कि इस बार सोनल की बेतुकी बात पूरी नहीं होने देगा|
  सुमेर शायद कम आंक गया था सोनल को| सोनल ने अपना निणर्य बता दिया|
" या तो सांची नहीं तो तलाक"
सोनल के ये तीन शब्द हथौड़े की तरह बजे सुमेर के कान में| सुमेर को ये अहसास था कि अगर मामला अदालत तक गया तो शायद निर्णय सोनल के तरफ जाए| वो कितने भी तर्क दे ले पर सोनल के अकाट्य तर्को के आगे सब तिरोहित हो जाएगे|
     कुछ भी हो वो मामला अदालत में नहीं ले जाएगा| अपनी और फजीहत न करवाना चाहता था या वो अंदर से एकदम टुट चुका था| जाने क्या था कि अब वो सोनल को अब अपने सामने बरदाश्त नहीं कर पा रहा था|सांची में उसकी जान बसती थी| सोनल ने उसे ही अलग कर देने की सोची| और अब इससे ज्यादा वो सुमेर का क्या बिगाड़ पायेगी?
   सांची को खुब समझा-बुझा कर उसने सोनल के साथ कर दिया इस वादे के साथ कि वो बीच-बीच में उससे मिलने आता रहेगा| सांची अब इतनी छोटी नहीं रह गयी थी कि उसे अपनी माँ की ये हरकत समझ न आती| उसका मन विरोध करता था| वो कभी भी सुमेर के आगे सोनल को नहीं रख पाएगी| पर अपने प्यारे पापा की बात काटना भी उसने नहीं सीखा|
     आधे मन से सांची ने माँ के साथ जाना मजूंर किया| सोनल खुश थी अपनी जीत पर| पर उसे नहीं मालूम था की जिसे वो अपनी जीत समझे बैठी हैं वही उसे जीवन का वो सबक सीखाने वाली हैं जिसे उसने अब तक सीखना ही नहीं चाहा|
   सांची आ तो गयी माँ के साथ पर उसने कभी अपनी माँ को माफ नहीं किया| उसने हर बात पर अपने पापा और दादी को ऊँचा रखा|
     सोनल को ये कठोर सबक उसी की बेटी ने सीखाया कि रिश्ते बहुत तहजीब से निभाने पड़ते हैं| अपने हिसाब से हर रिश्ते नहीं चलते हैं| उन्हें सहेजना-संभालना पड़ता हैंऔर उसके लिए थोड़ा झुक भी जाना पड़ता हैं|जब सोनल की बेटी ने उसी की जुबान में सोनल को ये सच्चाई दिखाई तब सोनल को शिद्दत से अहसास हुआ उसने अपने व्यहवार से खो ही दिया एक हीरे को|
    आज जब सुमेर दिखा तो जाने कितनी बाते घुम गयी सोनल के जेहन में| उसने ठान लिया कि जब सुमेर आयेगा तो अपनी गल्तियो की माफी मांगेगी उससे| उससे शादी करके सुमेर ने केवल दुख ही देखे| जाने कौन से अनकिये गुनाहो की सजा दे दी उसने सुमेर को|
       आज उसने सांची को भी धन्यवाद दिया| आखिर कर उसी की वजह से ही तो आज उसका मन ऐसा कुछ सोच पाया| वरना आज तक तो वो अपने में ही जी रही थी|
    सोनल की आँखो से पछतावे के आँसु बह चले जिसमें उसके सारे दंभ बह निकले|

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