सुमेर इस वर्जना से बचने के लिए अधिक से अधिक टूर पर ही रहने लगा| रानी को सोनल ने छिटका सा दिया था| अब सांची के साथ सोनल अधिक से अधिक समय बिताने लगी| उसके मन की वही जान सकती थी
सांची भी कितने दिन अपनी माँ से अलग रह सकती थी| धीरे-धीरे वो सोनल के करीब आने लगी| बच्चे तो मिट्टी का खिलौना होते हैं| जिस सांचे में ढालो ढल जाते हैं|
सुमेर इधर कई दिन तक टूर पर नहीं गया था| सोनल और सांची के बीच की मिटती दूरी देख उसे अच्छा ही लगा| पर इतने दिन सुमेर का घर पर बने रहना सोनल के शक को फिर हवा देने लगा|
एक दिन सवेरे जब सुमेर सो कर उठा तो उसे लगा कि सोनल किसी चीज को खोज रही हैं| पुछने पर पता चला कि उसके सोने की चेन नहीं मिल रही हैं|
" घर में रानी के सिवा कोई आता नहीं हैं| फिर वो चेन आखिर गयी कहाँ?" सोनल बोल उठी|
" माँ सारा घर रानी को सौंप गयी थी| कोई चीज इधर से उधर न हूई| कितने बार पैसे यूँ ही टेबल में रखे रहते हैं| कभी कुछ कम न हुआ| " सुमेर बोला|
" बड़ा हाथ मारने की फिराक में थी| छोटी- मोटी चीजो से कहाँ पूरा पड़ता|", सोनल बोली|
सुमेर को सोनल की ओछी बुद्धी पर तरस आया|
सुमेर के मना करने के बाद भी रानी को बुला सोनल ने कड़ी पुछताछ की| रानी के लिये ये बहुत बड़ा इलजाम था| एक इज्जत ही तो थी उस गरीब के हिस्से| उसे भी मेमसाहब तार-तार करना चाहती हैं|
रानी ने निरह भाव से सुमेर को देखा| सुमेर जैसे हार गया था| ईष्या ने सोनल का स्तर कितने नीचे गिरा दिया हैं| मगर मामले को पुलिस तक न ले जाने के लिए सुमेर को रानी को कहना पड़ा कि अब से इस घर के दरवाजे उसके लिए बंद हैं|
रानी की और फजीहत न हो इसके लिये यही उचित लगा सुमेर को| आनन-फानन में दुसरे नौकर का इतंजाम कर लिया सोनल ने| जैसे इसी ताक में बैठी थी सोनल|
रानी खुब रोयी-गिड़गिड़ायी पर सोनल के जैसे कोई असर न हुआ| सुमेर को सारा सार समझ आ गया क्योकिं जिस हार के लिए सोनल ने सारा खेल रचा था वो सुमेर को सोनल की ही अलमारी में नीचे के खाने में मिला| सुमेर ने यही सोचा कि उस गरीब को यूँ ही निकाल देती इतना बेइज्जत कर निकाल कर क्या मिला सोनल को?
शायद इस एक इलजाम के बाद उसे कही काम भी न मिले| और हुआ भी यही| सुमेर की आँखो के आगे रानी के भुख से बिलखते बच्चे ही घुमते रहे|
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