अपने होने का इतना गुरुर न कीजिए जनाब,
इस जहाँ में और लोग भी बसते हैं|
  
उसकी जिदंगी मकबूल रहे,
इसलिए रोज टुट-टुट कर जिया हूँ मैं|
 
पसंद के भी पैमाने बदलते हैं,
आज मैं तो कल कोई और|
  
गुजर जाने दो मुझे उन रास्तो से,
वो न सही,
उनके कदमो के निंशा तो साथ होगे|

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