बेदिल तारीफ न किया करो,
जमीर जख्मी होता हैं|
    
पत्तियों में पड़ी बुंदो के जैसे,
आँखों में सिमट आए आँसू,
जज्ब करते तो आँखो को शिकायत थी,
बहाते तो उनको|
 
बड़ी बेमुरव्वत सी हो गयी हैं जिदंगी,
जितना समझना चाहो,
उतनी उलझती जाती हैं|
 
'अजिज आ गए,
'अजिजो' की 'अजिजी' से,
जख्म देते बेहिसाब,
और पुछते हैं 'सब खैरियत'|

लफ्ज जख्म गहरा देते हैं,
गर अहसास होता ,
तो बेजुबान ही रहते|

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