रोमी की सोच जो भी बनी हो|पर बेटे ने बहू की बाते शायद अपने माँ-बाप को बता दी थी| तभी न आंटी-अंकल का मन बहू की तरफ से एकदम उखड़ गया था| बेटा की भी अपने माँ-बाप के लिए कोई खास जगह बनी हो ऐसा बिल्कुल न था|
उनकी छोटी बेटी के हाथ तंग रहते थे| माँ-बाप से अपने दुःख रो लेने की उसकी आदत न थी पर देख तो आये थे दोनो उसकी गृहस्थी को|खुब सोच-समझ कर खर्च करना पड़ता था| दूसरी ओर उनका बेटा था जिसके जीवन में उन्होने केवल सुख ही तो भरने की कोशिश की थी पर बदले में वो उन्हें सम्मान भी न दिला पाया था|बहू ने भी उनकी इज्जत मिट्टी में मिलाने में कोई कोर-कसर न छोड़ी थी|
अंकल ने ठान लिया कि अब कुछ कठोर फैसले लेने ही होगे|बेटा-बहू से सुधार की उम्मीद बेकार थी| पर इसके चलते वो अपने पोते-पोती को किसी भी सुख से वचिंत नहीं रखना चाहते थे|
भगवान के घर से बुलावा आये और उनकी सब संपत्ति बिखर जाए इससे पहले ही उन्होंने अपनी वसीयत तैयार करने की ठान ली|
वकील घर पर न बुला उन्होंने वकील के चेम्बर में जा सारी formality पूरी की|
वक्त ने फिर वो रुप दिखाया कि वसीयत तैयार होने के कुछ महीनो के बाद ही अंकल परलोक सिधार गये|उनके जाने के बाद उनकी वसीयत पढ़ी गयी|
आंटी को ता जिदंगी सारी संपत्ति का मालिकाना हक दिया गया|ताकि उन्हें कम से कम पैसो के लिए किसी का मोहताज न होना पड़े| बेटियों को आंटी के रहते खानदानी जेवरो का बड़ा हिस्सा और कुछ जमीन का हिस्सा दिया गया| बाकी पर आंटी का हक उनके रहते , था| उनके बाद सारी संपत्ति पोते-पोती के नाम कर दी गयी थी| बेटे-बहू के हिस्से केवल उस घर में रहने का था जिसमें वो अब तक रहते आये थे| उनके जीवन तक|वो भी इस बिना पर की वो अांटी के प्रति अपना व्यहवार मानविय रखेगे| वरना आंटी को उन्हें घर से बेदखल कर देने का पूरा हक दिया गया|
इस वसीयत ने आंटी के मन में सुकून भर दिया| अंकल ने जाने से पहले सबका भविष्य सुरळित कर दिया था|
इन सबके एक आध साल बाद रोमी-रवि ने अपना घर बदल लिया हैं| पर वो अब भी आंटी से मिलने जाते हैं| सुना हैं बेटे ने वसीयत के खिलाफ कोर्ट में अर्जी दी हैं| फैसला आंटी के ही हक में होगा ये रोमी को यकीन हैं|
यह फैसला शायद आंटी को बेटे की बदगुमानियों से दूर तक सके|शायद बेटे का मोह टुटे| जो आंटी के हक में अच्छा भी होगा|
उनके सुखद भविष्य की कामना के साथ|
इति
CONVERSATION
सदस्यता लें
टिप्पणियाँ भेजें
(
Atom
)
About me
Popular Posts
-
अपनी बालकनी से झाकंते नेहा ने पहली बार वैदेही को देखा था|ट्रक से उतरते सामान पर उसकी नजर टिकी थी|उसके पति तबादले पर यहाँ आए लग रहे थे| आस-पा...
-
नेहा ने तबादले से होने वाली टुटन को दिल से महसूस किया था| जब पैर जमने लगते और दोस्तो की ऱेहरिस्त लंबी होने लगती तब वहाँ से उखड़ किसी दूसरी ...
-
समय ईशा स्कूटी स्टैंड में लगा घर के अंदर प्रविष्ट हुई|सामने स्वरा बैठी थी पर ईशा उसे अनदेखा कर किचन की ओर बढ़ गयी|उसका ये व्यवहार स्वरा को आह...
-
बैसाखी वो खासी पुरानी इमारत थी जिसके तीसरे माले में वह रहती थी। ऊपर तक चढ़ते मुझे हफनी आ गई। "रेनू के हाथ में जादू है। एक बार उस...
-
विश्व हिंदी दिवस की आप सभी सुधीजनों को शुभकामनाएं। इस अवसर पर अपने कुछ हाइकु पटल पर प्रेषित कर रही हूँ। हिंदी ही भाषा विश्व पटल पर मान बढ़ाये...
-
आज दीना बाबू को एहसास हुआ होगा|कि कभी कभी मान की अधिकता न केवल रिश्तो में दूरियाँ ले आता हैं बल्कि कितने काम बिगाड़ देता हैं| इतना कि फिर उस...
-
जेवर "जिज्जी, क्या सोचा? मालू की दुल्हन की गोद भराई में क्या देना है? सोना तो आग पकड़े है। पुन्नी बता रही थी कि पचास के ऊपर पहुँच गया है...
-
रामलाल की बिटिया निम्मो की आज शादी हैं| दो गली छोड़ श्यामलाल के घर से रामलाल के घर के पूराने संबंध हैं| पारिवारिक रिश्ते बहुत ही ...
-
लकीरे राहुल के घर का आज गृहप्रवेश था|बड़े शौक से बनवाया शानदार घर| पूरा घर गुलाब और गेंदे की लड़ियों से गमक रहा था|अभी मेहमानो का आना शुरू न...
-
गुरु मंत्र मैं अपनी ही बहन का फोन "इग्नोर"करने लगी थी|मुझे लगता कि वो हर बात को लेकर कुछ ज्यादा ही परेशान हो जाती हैं|फिर वो समय ...
0 comments:
एक टिप्पणी भेजें