अपनी बालकनी से झाकंते नेहा ने पहली बार वैदेही को देखा था|ट्रक से उतरते सामान पर उसकी नजर टिकी थी|उसके पति तबादले पर यहाँ आए लग रहे थे| आस-पास से आये होते तो ट्रक न करते| हाथ गाड़ी से ही काम चल जाता|
सर्दियों के दिन थे|नेहा बालकनी में आती धूप के आखिरी कतरे को भी अपने में समेट लेना चाहती थी|यही वजह थी कि वो अब तक बालकनी में अटकी थी|
किसी की भी गृहस्थी का सामान उतरता-चढ़ता देखना नेहा को जाने क्यों शुरु से ही पसंद था|ऐसा कोई विशेष कारण न था| पर पसंद था तो पसंद था| सामान देख उनकी गृहस्थी के मापदड़ बना लेती|
खैर, जब वैदेही को बालकनी से देखते नेहा ने पहली बार देखा | आँखो पर मोटा चश्मा चढ़ा था पर चेहरे पर बहुत सौम्यता थी|वैदेही ने सर उठा देखा पर उसके होठो पर हल्की सी भी मुस्कान आयी हो ऐसा नेहा को नहीं लगा|
बातूनी नेहा को वैदेही बहुत अपने में सिमटी लगी|" मुझे क्या"सोच नेहा ने अपने कंधे झटक दिये|
उनकी कॉलोनी में २०-२५ ब्लॉग बने थे| हर ब्लॉग में ८ फ्लैट थे|नेहा के ब्लॉग में तीन फ्लैट जाने कब से खाली पड़े थे|सामने फ्लैट में नया शादी-शुदा जोड़ा रहता था| जिन्हें अपने से परे दूनिया की कोई खबर ही न रहती थी|हाँ, सबसे नीचे फ्लैट में जो भाभी रहती थी वो बड़ी मिलनसार थी|नेहा जब- तब उनके यहाँ हो लेती| पर भाभी का कभी भी उनके यहाँ न आना कभी उसे खल जाता| भाभी भी क्या करती? बढ़ती उम्र ने उनके घुटनो पर असर दिखाया था| और बिना प्रयोजन तीन माले चढ़ नेहा के यहाँ जाना उनके बस का नहीं था|
नेहा के बहुत इसरार करने पर भाभी उसी से चिरौरी करती की नेहा का मन ही नहीं भाभी के पास बन आने का नहीं तो नीचे के खाली फ्लैट के लिए अभी तक "ऐप्लाई" कर चुकी होती| बार-बार होते तबादलो और बांधते-खोलते सामान ने नेहा का मन उकता दिया था|इसलिए भाभी की चिरौरी नेहा को जरा न भाती|
वैदेही का नीचे के फ्लैट में बन आना नेहा को अंदर से उत्साहित कर गया था|
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अच्छी लग रही है l
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