इस बार की भाभी की चिरौरी नेहा को अदंर तक कचौटी| उसके बाद कुछ साबका ऐसा पड़ा की नेहा का नीचे उतरना न हुआ| दो दिन तक जो नेहा का भाभी के घर जाना न हुआ तो तीसरे दिन उनका बुलावा आ गया|
नेहा भरी बैठी थी इसलिए उसने नीचे उतर आने में असमथर्ता दिखाई| पर नेहा भी जानती थी कि गरज उसकी हैं भाभीजी की नहीं|
नेहा की सोच अपने में ठीक भी थी क्याें कीरोज सुबह के ११बजते न बजते भाभीजी के यहाँ सहेलियों की महफिल सज जाती|घरो की दीवार इतनी मोटी न थी कि उनके घर से उठती ठहाको की आवाज नेहा के कानो तक न पहुँचती|ऐसी कसमसाहट के कारण ही अक्सर उसे हथियार डाल देने पडते|ऐसी महफिल में पहुँचने के उतावलेपन में उसके हाथ जल्दी जल्दी चलते| ११ बजते न बजते वो हाजिर होती भाभी के यहाँ|
खैर, यहाँ बात वैदेही की हो रही थी| सो भाभीजी ने खुब बुलावे भेजे वैदेही के लिए की तनिक वो भी आ बैठे इन बैठको पर|जानती नेहा भी थी कि अभी वैदेही का निकल पाना कितना कठिन होगा| पड़ोसी होने के नाते नेहा ने वैदेही के यहाँ चाय नाश्ता भिजवा दिया था| पर उससे आगे उनके बीच कोई संवाद नहीं हुआ था|चाय -नाश्ते के बरतन वापस करने में भी वैदेही का आना न हुआ था| नहीं तो नेहा तभी थोड़ा घेर लेती वैदेही को|
वैदेही को अभी जुम्मा-जुम्मा एक महीना भी तो नहीं हुआ था आये|सामान जमाने और दूध, फल, सब्जी, गृहस्थी का और सामान जुटा लेने में वक्त तो लगता न|भाभी के बुलावे पर वैदेही ने बहुत नरमाई से वक्त न मिल पाने की मजबूरी जाहिर की|
जब भाभी ने ये बात नेहा को बतायी कि दो-तीन बार गुहार लगाने पर भी वैदेही को तनिक समय न मिला उन लोगो से मिल लेने का तो नेहा को सुन भाभीजी पर ही क्रोध आया|क्या तबादले के बाद दूसरी जगह से आ नये सिरे से सब कुछ जमाने का दर्द भाभी ने नहीं झेला? ये तो हम सबका साझा दर्द था| इससे परे भाभी कहाँ हो गयी| और फिर वैदेही पर अभी दो बच्चो के सारे काम की भी जिम्मेदारी हैं| भाभी का क्या दोनो बच्चे बाहर, आदमी ऑफिस में| सारा दिन सत्तारी ही तो बनी रहती हैं| प्रकट में कुछ न कहा नेहा ने पर भीतर ऐसे तिक्त भाव उभर आए नेहा के|
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