परछाई-पहली किस्त

शाम का धुधंलका ज्यादा नहीं गहराया था| सड़क पर गहमा-गहमी नहीं थी|पहाड़ो पर शाम जल्दी ढल जाती हैं|आवा-जाही न के बराबर|
  प्रिया अपने कमरे में अलाव के सामने बैठी थी|शॉल को कस कर लपेट रखा था अपने चारो ओर| अलाव में जलती लकड़ियो के चटकने की आवाज़ के  अलावा और कोई आवाज न थी|स्तब्ध सन्नाटा पसरा था|
  कोई और होता तो इतनी नीरवता से ऊब कब का चला गया होता|  मगर प्रिया को पसंद था ये सब|
  रेस्ट हाउस के पीछे की तरफ नौकरो के रहने के कमरे थे| इसमें बिरजू के अलावा एक माली अपने परिवार के साथ रहता था|
  बिरजू लबां- चौड़ा,बलिष्ण कद - काठी का युवक था| प्रिया जब पहली बार आई थी यहाँ तो उसकी नज़र बिरजू पर अटक सी गई थी|
    बिरजू उसे बड़ी बहन सा दरजा देता था| और उसके प्रति सजग सा रहता था| दस आदमियो की ताकत थी उसमें| प्रिया भी बिरजू के आस-पास होने से अपने को सुरळित महसूस करती|
  

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