बेगार

बेगार
  
                                                                  आज छगनु के हाथ-पैर जवाब दे रहे है| काम करते उसका आधा ध्यान घर में,खाँसी से बेदम हुई माँ पर अटका है| पड़ोस की लड़की से कह वो माँ की दो रोटी का इंतजाम तो कर आया है, पर रह -रह उठती खाँसी के दौरे माँ से ज्यादा उसे बेहाल कर रहे हैं| 
   रात भर अपनी गुदड़ी में लेटा छगनु यही सोचता रहा , "इसी हालत में सही पर माँ उसके साथ बनी रहे|"
 केवल माँ के इलाज के लिए ही तो वो मालिक की सौ गालियाँ खाता है| मालिक इतना दयावान तो है कि ढाबा बंद होने पर बचा-खुचा छगनु को पकड़ा देता है| माँ और उसकी रात की रोटी का सहारा हो जाता है| कभी सुबह भी इन्हीं बची रोटियों को पानी से निगल काम पर निकल लेता है|
   महीने के आखिर में मालिक के सही-गलत आरोपो से कतर-ब्योत कर मिली तनख्वाह को सहेज कर रख लेता है,माँ के इलाज के लिए|
     कल ढाबे पर ही पास गाँव के हकीम का पता मिला है| इलाज की फीस ऊँची है| पर छगनु तैयार है|उसे माँ चाहिए | हकीम ने घर चले आने की मनाही कर दी,इसलिए छगनु को एक दिन की बेगारी कटवाना मंजूर है| जानता है मालिक फिर भी दूसरे दिन हलक कर काम लेगा| हकीम ने ढाढस पकड़ाया है कि इलाज लंबा चलेगा पर माँ ठीक हो जायेगी|
माँ लाख गुहार लगाती है,"इन मुये हकीमो का क्या!!!! तु काहे अपनी सारी मेहनत इनके कदमो में डाल रहा है|"
 पर आज छगनु खुश है, हकीम के रुप में उसे भगवान मिल गये है| तो क्या अगर उसे बरसो भी मालिक के यहाँ बंधुआ बनना पड़े |

अंजू निगम
देहरादून

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