दरवाजा

दरवाजा

उस रोज़ दरवाजे पर जो दस्तक थी,
उन हाथों की थाप अजनबी लगी।
दरवाजा खोला तो बाहर शोहरत खड़ी थी।
उसके चारों ओर अजीब उजाला भरा था,
मेरी आँखें चुंधियाने लगी थी।

मन मेरा हाथ छुड़ा चल दिया,
मन मेरा कोमल था,अजनबी था दुनिया से।
मुझे मालुम था मन भटक जायेगा, बह जायेगा,
फिर हुआ भी वही,मेरा मन बह निकला।
बहते हुए मिल गया कामयाबी के समुद्र में,
और खो गया वहीं।

मैं और मेरा मन फिर कभी नहीं मिलें,
अब दरवाज़े पर होती हर दस्तक,
खौफ़ज़दा करती हैं,
जाने इस बार कामयाबी मेरा क्या छीन ले।
          
अंजू निगम
देहरादून

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