नज्म
वो बंद मुस्कान आज फिर खिली थी,
कल रात सपने में जब वो मिली थी|
फुरसत में जब भी याद किया तुमने,
हया की लाली पलको पर हिली थी|
हंसी वादियों का मौसम खुशगवार सही,
जज्बातो में भीगी हर बार मैं छिली थी|
वो आँखो के कोर क्यों धुंधला गये थे,
जो आरजू थी न तेरी, वो दिली थी|
तेरा वक्त भी क्या कभी रहा था मेरा,
यही शिकायत उनके लबो पर सिली थी|
आंसमा रोक लो वो चाँद आज मेरे लिये,
चाँदनी की वो नजर ,आज फिर मिली थी|
अंजू निगम
देहरादून
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