सादर समीक्षार्थ 🙏एक प्रयास :-
तैरती है अकसर यूँ ज़िन्दगी ग़रीब की
उम्मीद के समंदरों में नावें हैं नसीब की ।
संघर्ष के उफ़ानों में हैं मौज़े ज्यूँ कसौटियाँ
पार फिर भी पाना ले के नाव सङ्ग नेकियाँ
ये लेखनी पतवार सी चल रही अदीब की
उम्मीद के समंदरों में नावें हैं नसीब की ।
बढ़ रहा था मौत का छिप छिप कर भँवर
माँझी पर न हो सका फिर कुछ भी असर
गुण दोष कर्म फल लिखे कलम मुजीब की
उम्मीद के समंदरों में नावें हैं नसीब की ।
साहिलों ने हँस दिया देख हर ये माजरा
सदा हसीन है युगों से हौंसलों का आसरा
जीत ज़िद की अंत में होनी थी हबीब की
उम्मीद के समंदरों में नावें हैं नसीब की ।
✍🏻 महेश पँचाल 'माही' (16.05.2019)
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