शिव की जटा से होकर उतरी हूँ,
विष्णु के चरण कमल से निकली हूँ,
मैं पवित्र-पावन गंगा हूँ
मैं पवित्र-पावन गंगा हूँ|
हे मानव!! तुमने मुझे मान दिया,
माँ जैसा सम्मान दिया,
मैंने फिर न कोई भान किया,
तुम सबका उद्धार किया|
पर आज कहाँ वो "माँ" सा सम्मान गया
क्यों मेरे पवित्र आँचल का ये हाल किया,
मुझमें ही, पाप अपने धो पवित्र हुये,
पर मुझे ही दूषित, शोषित हर बार किया|
उन्नति की दौड़ में तुने ये विषपान किया,
क्या मैं इतना जी पाऊँगी,जितना तुमने मार दिया
माँ हूँ ,तुम सब बच्चे हो मेरे,
तो इतना साधिकार कहूँ
पवित्र-पावन गंगा हूँ, माँ सा ये सम्मान रहे|
मेरा तो उद्धार करो,अपना भी उद्धार करो|
अंजू निगम
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