कल कुछ ख्वाबों से मुलाकात हो गयी,
वे बहुत बड़े थे,मैं सहमा,सकुचाया सा,
ख्वाबों ने पहचान लिया हमारा अंतर|
फिर कुछ हुआ यूँ उन ख्वाबों ने,
मुझे कुछ हसरते,कुछ ख्वाहिशें पकड़ायी|
फिर हुआ कुछ यूँ,
मैंनें उन ख्वाहिशों को पाल लिया|
मेरी ख्वाहिशें बड़ी होने लगी,
और ख्वाब छोटे|
मेरी ख्वाहिशें ने उन ख्वाबों को दबा दिया,
जो बहुत कोमल,पाकीजा थे|
अब बस मैं ख्वाहिशें पालता हूँ|
अरसा हुआ,ख्वाब सजे उन आँखो में,
ऐसी रात अब नहीं आती|
★अंजू निगम★
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