जनाना भाग में कमरे की सुसज्जा की ओर विशेष ध्यान दिया गया था| दीवारे और छत की रंगीन पत्थरो से की गई नक्काशी देखने लायक हैं|
रानी का कमरा भी जस का तस बना हैं| कहा जाता हैं कि चूंकि रानी छोटे कद की थी अतः उनका बिस्तर भी उसी आकार का बनाया गया था|बिछौना बहूत ही खुबसूरत नक्काशीदार कपड़े का हैं| रानी के प्रयोग में लायी जाने वाली चीजो के अलावा एक चीज ने जो सबसे ज्यादा ध्यान आकर्षित किया वो था बिजली का पंखा| आप सोच रहे होगे कि इसमें अलग क्या? तो ये बताती चलूं की उस दौरान बिजली की व्यवस्था नहीं थी| पंखा कुछ इस तरह चलता था कि इसमें तेल डाला जाता था| और फिर उसी के भार से इसकी मशीने चलती थी| इसमें बिजली या बैटरी जैसी किसी भी चीज का इस्तेमाल नहीं होता था|
एक स्थान जो रसोई के इस्तेमाल के लिए ही था| इसमें उस समय खाना बनाने और खाना खाने दोनो के बरतन 'display' किए गये हैं| कहा जाता हैं कि नवराञो में राजा खुद अपने हाथो से अपना खाना बनाते थे| रानी खाना बनाने में हाथ बटाती थी|
थोड़ा हट कर एक छोटे कमरे में खल-मूसल, हाथ से अनाज पीसने की चक्की, सील-बट्टा रखा हैं| इसे उस समय की स्ञियों का jim भी कह सकते हैं|
इसके अलावा तत्कालीन राजा के ससुराल से आने वाली चांदी की बग्गी भी रखी हैं| जब रानी पहली बार विदा होकर ससुराल आयी थी| चांदी की ही बनी कितनी ही चीजे यहाँ रखी गई हैं| वैभव अपनी पूर्णता में बिखरा हैं मानो| चांदी का बना हिडोंला भी आपको यहाँ दिखेगा|
एक कमरे में जो रानी के कमरे से सटा था उसमें lift का भी प्रावधान था| उससे ही आगे चले तो एक कमरे में ऊँचे आसन में राजा और उनकी पटरानी के बैठ कर खाने का स्थान बना हैं| उसके ठीक नीचे अन्य रानियों के खाना खाने की व्यवस्था की गई थी|
बरसात के मौसम में जब सूरज के दर्शन नहीं होते थे उस समय के लिए दीवार में ही सूरज की बड़ी सी सोने की बनी आकृति बनायी गयी हैं राजा और रानी दूर से बैठ कर ही इसके दर्शन कर लेते थे|
तीसरी मंजिल में एक लंबा और चौड़ा कमरा बनवाया गया था जहाँ रंगीन शीशे लगवाये गये थे| यहाँ से रानियाँ बैठ कर नीचे हो रही गतिविधीयाँ देखती थी|
मोर की पूरी आकृति आपको बारीक शीशे के काम में नजर आयेगी|
सबसे आखिर में तत्कालीन राजा की बेटी के ब्याह का पूरा मंडप जो चांदी का बना था, नजर आयेगा| सबसे आखिर में महल में होने वाले हर उत्सव के आयोजन के लिए विशाल प्रांगण बना हैं| इसे किराये पर भी दिया जाने लगा हैं|
महल का सारा वैभव आत्मसात कर हम महल के बाहर आ गये|
उदयपूर का ये सफर तो खत्म हूआ पर यादो में हमेशा बस जाने के लिए|
यही समाप्त करती हूँ| आप सबका दिन शुभ हो|
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