याञा वृतांत

हम रात ७.१५ पर उदयपूर पहूँचे| मेवाड़ की धरती पर कदम रखने की अनूभुति ने अभिभूत कर दिया| राजस्थान का गौरवशाली इतिहास प्रस्तुत हो उठा|
         हम लोगो ने उदयपूर से पचास किलोमीटर दूर हल्दीघाटी जाने का निश्चय किया| हल्दीघाटी का नाम सुन कर ही एक सिहरन सी दौड़ गयी और शुरवीरता का वो इतिहास  साकार हो उठा|
       सबसे पहले हम लोग" हल्दीघाटी संग्रहालय" गये|ये संग्रहालय एक स्कुल टीचर" डा.श्रीमाली के द्वारा बनवाया गया था| डा.श्रीमाली ने बिना किसी सरकारी मदद के खुद इस सग्रंहालय को बनवाने का सारा खर्च वहन किया हैं| सग्रंहावय इतना रोचक तरीके से बनावाया गया हैं कि इसमें हल्दीघाटी का पूरा इतिहास सिमट आया हैं|
      करीब ३५ लोगो के  समूह को सिलसिलेवार तरीके से हल्दीघाटी का पूरा इतिहास बताया जाताहैं| पहले कमरे में प्रवेश करते बड़े सलीकेदार तरीके से " महाराणा प्रताप "द्वारा युद्ध में प्रयुक्त नख से शिख तक के सारे अस्ञ दर्शाये गये हैं| इसके अलावा १५ मिनट के वृतचिञ में हल्दीघाटी के इतिहास की रोचक प्रस्तुति होती हैं|
  राजा उदयपूर के सुपुञ राणा प्रताप बेहद साहसी और शुरवीर थे| अकबर ने जब सारे हिदुंस्तान को अपने हक में करने की मुहिम छेड़ी थी तब राणा प्रताप के पास भी संदेशा आया मगर उन्होने किसी के भी आगे घुटने टेकने से साफ इंकार किया| तब अकबर ने मेवाड़ की ओर आधुनिक हथियारो से लैस एक बड़ी सेना भेजी| इस युद्ध में अकबर खुद शामिल नहीं हुए|
       अकबर को शायद ये गुमान था कि राणा प्रताप को उनकी विशाल सेना यूँ ही परास्त कर देगी| मगर  उनकी ये सोच आगे चल कर इतिहास में निर्णायक मोड़ साबित हूई क्योकी इससे पहले तकरीबन सारे युद्ध अकबर की सेना के हक में हूए थे|
       अकबर की सेना २० ही पड़ रही थी राणा की सेना से| अकबर की सेना में विशाल सैनिको के अलावा हाथियों का एक विशाल दस्ता था|  राणा प्रताप के पास उनका अदम्य साहस एंव राजा पुंजा का साथ था जिनकी सेना"गुरिल्ला युद्ध" में परांगत थी|
    कल आपके साथ इतिहास के कुछ और पन्ने खोलेगे|चलेगे इस युद्ध के साथ जुड़े रोचक तथ्य को उजागर करते|

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