" कमल तलाई" की बात कर तो ये अपने आप में अनुठा फव्वारा था| इसके एक तरफ हाथी की मूर्ति लगी थी जिसकी सूड़ से पानी निकलता था| पानी की धार से रानियाँ मौसम और फतेहसागर झील में पानी के स्तर का पता लगा लेती थी| अगर पानी की धार दूर तक पड़ती तो अच्छा जलस्तर होगा|
मूर्ति के ठीक सामने राजा के बैठने का ऊँचा आसन बनाया गया था| एंव पीछे की तरफ रानियों के बैठने का झरोखा बना था| झरोखे की सजावट ठेठ राजपूताना कला को दर्शाती थी| राजा के आने पर रानियाँ यहाँ इकट्ठा होती और अपनी समस्याँए रखती थी|
कहा जाता हैं कि इस फव्वारे के बनने के अरसे बाद किसी ने इस "तलाई" में "कुमूदिनी" के बीज डाल दिये थे| उसके बाद से इस तलाई में कमल की जगह कुमूदिनी के फूलो ने अपना आधिपत्य जमा लिया|
अब आखिरी"तलाई" की ओर ले चलते हैं| जैसे" सावन भादो" तलाई गर्मी को सोच बनायी गई थी उसके उल्ट ये तलाई सर्दी के मौसम को ध्यान में रख कर बनाई गयी थी| इसका नाम" रास रंग" तलाई था| इस तलाई में रौनक होली के रंगो से शुरु होती थी|
चारोओर से खुली ये तलाई भी गोलाकार घेरे में ही बनी थी पर इसमें पौधो की तादाद बहूत कम थी|
होली के दिन इस तलाई में रंग भर दिया जाता था| " सहेलियों की बाड़ी" में रानियों की और " सिटी पैलेस" में राजा होली खेलते थे| फूलो की होली खेलने का यहाँ भी रिवाज था| वैसे भी उस समय सारे रंग " टेसू" के फूलो से ही बनाए जाते थे|
रात में रंगारंग क्रार्यक्रम होता था जिसे थोड़ा अलग हट कर बने झरोखे से रानियाँ देखती थी| माहौल बहुत ही उल्लासपूर्ण हो जाता था|
इस "तलाई" से निकलते " golden cypress" मानो आपको अलविदा कह रहे हो|
अगले अंक में आपको हल्दीघाटी की सैर पर ले चलेगे| महाराणा प्रताप की शुरवीरता की आलौकिक कथा से रुबरु कराने|
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