आइए आज आपको मेवाड़ की ऐतिहासिक भूमि में ले चलते हैं|वैसे तो राजस्थान का इतिहास अटा पड़ा हैं अपने गौरवशाली गाथाओ से|
पर आज आपको उदयपूर ले चलती हूँ| हाल ही में जब उदयपूर जाना हूआ तब वहाँ के इतिहास के कुछ पन्नो को छुने को सुनहरा अवसर हाथ आया| यहाँ कितने ही अभिभूत कर देने वाले स्मारक अपनी पूरी शानो-शौकत से खड़े हैं|
राजा सग्रांम सिंह द्वारा अपनी रानियों के लिए बनाया ' सहेलियों की बाड़ी' का उल्लेख विशेष रुप से करना चाहूंगी| फतेह सागर झील से महज ३ किलीमीटर के फासले पर ' सहेलियों की बाड़ी स्थित हैं|
पहले ये बाड़ी राजा के अधीन थी बाद में ये सरकार ने अपने अधीन कर इसे आम जनता के लिये खोल दिया|
कुल मिला कर यहाँ '५ तलाई 'हैं| जिनके बनने के पीछे दिलचस्प कहानियाँ प्रचलित हैं|
पहली तलाई ' स्वागत तलाई' हैं| रानियों के इसरार पर राजा ने इस 'बाड़ी'का निर्माण करवाया था| परपंरा के अनुसार फूलो से मेहमानो का स्वागत किया जाता हैं| पर यहाँ कतार से लगे फव्वारो से स्वागत किया जाता था| उस समय बिना बिजली के इतने ऊपर पानी ले आना भी अपने आप में मिसाल हैं|इसके लिए सुरंग बना ८० फीट ऊँची स्थित फतेहसागर झील से पानी ले आने की व्यवस्था की गई|
कहा जाता हैं कि जब इन फव्वारो का निर्माण हुआ था तब इसमें से निकलता पानी १० फीट से ऊँचा जाता था| पर बाद में पानी की किल्लत के चलते सुरंग में दीवारो का इस तरह निर्माण किया गया कि इनकी ऊँचाई घट कर दो-तीन फीट रह गयी हैं|
कतारो से लगे फव्वारो के बीच से निकलना, मन में एक अजीब सा सुकून भर देते हैं|
इसके आगे जाने पर जो फर्श बनाया गया था उसके पत्थर जोधपूर और जयपूर से मगँवाये गये थे| बनाने का तरीका कुछ ऐसा था कि ये लहरो सा आभास देता था|
आगे के चार फव्वारो की कहानियाँ भी कम दिलचस्प नहीं| पर उन तक कल पहूँचेगे|
मेरे साथ बने रहियेगा| आप सब का सहयोग महत्वपू्र्ण हैं|
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