नेहा ने तबादले से होने वाली टुटन को दिल से महसूस किया था| जब पैर जमने लगते और दोस्तो की ऱेहरिस्त लंबी होने लगती तब वहाँ से उखड़ किसी दूसरी जगह बस जाने का आदेश आ जाता|
वैदेही से उसका मिलना कई दिन तक न हो पाया| हलांकि वो अदंर ही अदंर कसमसा रही थी उसके यहाँ हो लेने को|एक दिन उसने सोच ही लिया आज तो धावा बोल ही दे वैदेही के यहाँ| भई बुलाया हैं मिलने ऐसे ही थोड़े न पहुँच रही हूँ|
वैदेही शायद कपड़े धोने में उलझी थी|दरवाजा खोलने पर नेहा को एक बार शक हुआ कि शायद वो गलत घर आ गयी|आँखो पर चढ़ा मोटा चश्मा बता गये कि वो सही पते पर सही इंसान के सामने खड़ी हैं| वैदेही एकबारगी उसे देख सकपका ही गयी| शायद यूँ किसी के चले आने की या तो वो आदी न थी |
अंदर का हाल भी कोई खास खुशगवार न था| जल्दी-जल्दी उसने सोफे पर फैले कपड़ो की गठरी बनाई और पीछे किसी कमरे में टिका आई|फर्नीचर के नाम पर सोफा सेट, दीवान और एक लबीं मेज जो बहुत कुछ टिकाने के काम आती होगी| एक तरफ कपड़े देख यही लगा कि सारे सामान को समेट इस्तरी भी इसी में निपटा ली जाती होगी| खानाबदोश जीवन की एक और मिसाल|नेहा ने मन ही मन ये सब देख वैदेही और उसकी गृहस्थी को तोला|काम चल ही जाएगा इससे दोस्ती कर|
वैदेही थोड़ी देर में पानी का गिलास ले आयी| अपने को भी यथासभंव ठीक-ठाक करके|जैसा की कहना बनता था नेहा ने भी उछाल दिये ये शब्द," अरे!गलत वक्त आ गई| आपके काम का हरजा होगा|"
वैदेही भी उसी अंदाज में बोली" अरे काम तो सारे दिन के हैं| थोड़ी देर ही सही"|
वैदेही का ये बोलना नेहा को इत्मीनान दे गये कि चलो एक आत घंटे तो निकल ही गये समझो| वो सोफे में और भीतर तक धंस गयी|
वैदेही का धीरे-धीरे बात करना और उसकी बातो की आत्मीयता ने नेहा का मन हर लिया| शायद शुरुआती मिलन का लिहाज हो| नेहा ने जो वाकपटुता भाभी से सीख ली थी उसका आज नेहा ने सही इस्तेमाल किया|इतनी देर की बातो के निचोड़ से उसे इतना पता लगा कि वे जम्मु से तबादला होने पर यहाँ आये हैं| एक बेटा- बेटी हैं जो एक साल की छोट- बड़ाई के बावजूद एक ही साल, एक ही कळा और एक ही सेक्शन में थे|उच्च शिळा और अच्छी कोचिंग के कारण ही यहाँ का तबादला लिया|वरना वहाँ भी ठीक-ठाक ही बसे थे|
मूलतः उसकी ससुराल दिल्ली की थी और मायका हरियाणा के किसी छोटे कस्बे का|
चाय नाश्ते का दौर वैदेही ने जल्दी निपटा लिया था क्योंकी घड़ी की सुईयाँ जैसे-जैसे आगे बढ़ती जा रही थी वैदेही की कसमसाहट भी बढ़ रही थी|बार बार अंदर जा कुछ काम निपटा लेना नेहा के लिए "अल्टीमेटम"भी था कि बेटा अब उठ ही लो| आज काफी बाते खोद ली|
नेहा ने उठ लेने से पहले वैदेही को जल्द अपने घर चले आने को राजी कर ही लिया|
आज जो नेहा का भाभी के घर जाना न हो पाया तो उसका नेहा को बहुत मलाल भी न रहा| गपियाने को एक और साथी मिल गया था उसे|
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