पहली किस्त
देहरी पर खड़ा था बेटा|माँ की बुढ़ी आँखे भीग उठी| आखिर तो बेटा है मेरा| उसका खुन| इतनी जल्दी कैसे सफेद हो जाएगा|
वक्त की मार खाए चेहरे पर जमाने भर का सूकुन था|
बुढ़ी काया में जान सी आ गई| माँ बावरी सी हुई जा रही थी|बेटे को क्या खिलाए,कहाँ टिकाए| घर में तो टुटी चरमराती चारपाई के सिवा कुछ था ही नहीं|कभी जरूरत ही नहीं महसूस हुई|,
बेटा आया तो खुद को कोसने लगी|क्या सोचता होगा बेटा| माँ के अदंर चलते कशमकश से अंजान बेटा अपनी कशमकश में उलझा था|
0 comments:
एक टिप्पणी भेजें