कितने लफ्ज रहे अनकहे,
कितनी यादे यादे रही अनसुनी,
जुबान तो पैदा हुई,
पर सुनने वाले कान न हूए,
नाफरमानी न होती,
गर नज़रअंदाजी न होती

CONVERSATION

0 comments:

एक टिप्पणी भेजें

Back
to top