अपनो से घर गुंज रहा,यहाँ छायी वीरानी क्यों
रिश्तो की रीत चल रही,यहाँ न कोई सरमाया क्यों
सारे रंग बिखर रहे,यहाँ अंधियारा छाया क्यों
खुशियाँ वहाँ उमड़ रही,यहाँ काली बदली छायी क्यों
अपनो का सा अपनापन,यहाँ बेगानो का साया क्यों
               खाली झोली घूम रहे,
               अपनो के अपनेपन को,
               रिश्तो की डोर टुट रही,
                फिर साँसो की क्यों बने यहाँ

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