बेतरतीब औ बिखरा कमरा,
अब अच्छा लगता हैं,
बिस्तर पर पड़ा गीला तौलिया,
खुली उलझी चादरे,
उलटे-पलटे मसनद,
फैली किताब-कापियाँ,
सब अच्छा लगता हैं,
मेरे जिगर के टुकडे़ जो बसते हैं यहाँ,
जीते हैं क्योकीं जीना हैं,
उन माँ-बाप की तरह,
जिन्हें छोड़ आए कभी हम अपने पीछे

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